ग्रामीण क्षेत्रों में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन मैदान नहीं होने से खिलाड़ियों में बेहद परेशानी हो रही है। पाटी ब्लॉक मुख्यालय में अब तक एक भी कायदे का खेल मैदान नहीं है। यहां के खिलाड़ी खेतों में अभ्यास कर प्रतियोगिताओं में अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।
उबड़-खाबड़ खेतों में खेलते हुए यहां के कई खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर खो-खो, कबड्डी जैसे खेलों में परचम लहरा चुके हैं, लेकिन यहां सबसे बड़ी दिक्कत तब सामने आती है, जब 100 मीटर दौड़ के लिए बच्चों को 60 मीटर लंबे मैदान में दौड़ाया जाता है। यहां के बच्चे मानक वाले मैदानों में अपेक्षाकृत दौड़ नहीं पाते हैं। फुटबाल, हॉकी, क्रिकेट जैसे खेलों के बारे में तो यहां के बच्चे सोचते ही रह जाते हैं। अलबत्ता यह कबड्डी जैसे खेलों में ही अपनी नियति मानते आ रहे हैं।
साधनों का अभाव कामयाबी में रोड़ा
लंबी कूद में राज्य स्तर में नाम कमाने वाली नेहा बिष्ट का कहना है कि वह भी एक धावक के रूप में अपना कॅरिअर बनाना चाहती हैं, लेकिन साधनों का अभाव उनके सपनों को साकार करने में आड़े आ रहा है।
मैदान हो तो फहरेगा परचम
राज्य स्तर पर दौड़ में अव्वल रहे बबलू कुमार का कहना है कि उन्होंने कच्ची सड़कों पर दौड़कर यह मुकाम बनाया है, यदि कायदे का मैदान मिले, तो इस इलाके के युवा भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं।
हर वक्त रहती है खेल मैदान की कमी की टीस
कबड्डी में राज्य स्तर तक पहुंची भावना लडवाल का कहना है कि हमारी नियति खेतों में खेलने तक ही सीमित रह गई है। शहरी बालिकाओं की तरह वे भी अपना जज्बा दिखाना चाहती हैं, लेकिन खेल के मैदान की कमी की टीस हर वक्त रहती है।
प्रतियोगिताओं में होता है भ्रम
चक्का और गोला क्षेंपण में राज्य स्तर में अव्वल रही खष्टी गोस्वामी कहती हैं कि उबड़-खाबड़ जगहों पर खेलने की आदत से ग्रामीण खिलाड़ी मैदान में दौड़ते वक्त भ्रमित हो जाते हैं। अगर गांव में मैदान हो, तो ग्रामीण प्रतिभा भी आकाश छू सकते हैं।
उबड़-खाबड़ मैदान में होती है प्रतियोगिताएं
ब्लॉक खेल समन्वयक रबीश पचौली का कहना है कि उन्हें और उनके साथियों के लिए ब्लॉक स्तर की प्रतियोगिताएं कराना काफी मुश्किल हो जाता है। पाटी में दो छोटे-छोटे उबड़-खाबड़ खेल मैदान हैं। इन्हीं के सहारे ग्रामीण बच्चे अपना भविष्य खेल में तलाशते आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है।