1971 में पाकिस्तान के साथ हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में चंपावत जिले के जवानों का अहम योगदान है। युद्ध में जिले के 13 जांबाज शहीद हुए थे। इसके अलावा कई लोगों ने बहादुरी से लड़ते हुए दुश्मन के दांत खट्टे किए।
80 साल के हो चुके कैप्टन पीएस देव की आंखों में 48 साल पूर्व की युद्ध स्मृतियां आज भी ज्यों की त्यों हैं। उन्होंने बताया कि उनकी पलटन 6 कुमाऊं को पश्चिमी सेक्टर में भेजा गया था। वह सांभा से आगे बढ़ने लगे। उनको पाक की सीमा पर पहुंच आरसीएल में तैनाती मिली। उन्हें टैंक तोड़ने का आदेश मिला। पाक सैनिकों के बंकर में उनकी बंदूक ने ऐसा गोला दागा जिसमें सात पाकिस्तानी सैनिक हताहत हो गए। उनके साथ इस मोर्चे पर जय सिंह कुंवर, गणेश सिंह, मोहन राम भी थे।
कैप्टन एनके पुनेठा ने युद्ध में अदम्य साहस दिखाया। उन्होंने नागा रेजीमेंट में रहते हुए कृष्णा नदी के किनारे धर्मादा में मोर्चा संभाला। जहां से ढाका पहुंच पुनेठा ने अन्य साथियों के साथ 11 दिनों तक युद्ध में बहादुरी से मोर्चा संभाला। बाद में पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिए।
फोटो 15 एलएचजी 03पी व 04पी (दोनों सिंगल)
आज भी ताजा हैं युद्ध की यादें
बनबसा (चंपावत)। सेना के 5 राजपूत रेजीमेंट से अवकाश प्राप्त कैप्टन रामचंद्र भट्ट ने 1971 के युद्ध में शौर्य का प्रदर्शन किया था। वे 1968 में फौज में भर्ती हुए थे। आज भी उनके जेहन में युद्ध की यादें ताजा हैं। उन्होंने बताया कि 1971 में वह फौज में सिपाही थे। तब उनकी सेवा महज तीन वर्ष की थी। 1971 के युद्ध में कै. भट़्ट जम्मू कश्मीर के सुंदरबनी सैक्टर में तैनात थे। 3 दिसंबर 1971 को पाक ने भारत पर हवाई हमला बोल दिया था। पाक सेना भारतीय क्षेत्र मनोवरतवी नदी के पार भारत में प्रवेश कर गई थी लेकिन भारतीय सैनिकों ने जांबाजी से युद्ध करते हुए भारतीय गांव पलांववाला से पाक सेना को खदेड़ दिया। बताया कि पहले से ही तैयार पाकिस्तान टैंकों के साथ अचानक भारतीय क्षेत्र में युद्ध करने पहुंच गया था। तब वे 5 राजपूत रेजीमेंट के डेल्टा कंपनी में तैनात थे। उनकी यूनिट के चार्ली कंपनी के 11 जवान 1971 के युद्ध में शहीद हुए थे। सेना से अवकाश प्राप्त करने के बाद से वह बनबसा के आंबेडकर ग्राम फागपुर में कृषक की भूमिका निभा रहे हैं।
बहादुरी से लड़े थे बहादुर चंद
बनबसा (चंपावत)। युद्ध में शौर्य का प्रदर्शन करने वाले सिपाही बहादुर चंद मूल रूप से पिथौरागढ़ के हैं। इन दिनों वह खटीमा में निवास कर रहे हैं। वह फरवरी 1971 में सेना में भर्ती हुए थे। उन्हें 7 कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात किया गया। 1971 के युद्ध में वह छंब सेक्टर में तैनात थे। उनकी यूनिट को दुश्मन को खदेड़ने का काम सौंपा गया था। उनकी यूनिट ने मेला हाइट में 13 दिनों तक युद्ध किया। बताया कि छंब सेक्टर में तब उनकी यूनिट 7 कुमाऊं के अलावा 5 सिख रेजीमेंट और 9 गोरखा रेजीमेंट ने भी युद्ध में भूमिका निभाई थी।
1971 के युद्ध में शहीद हुए चंपावत जिले के 13 फौजी
कैप्टन उमेद सिंह माहरा, चामी चौमेल के सिपाही जोध सिंह, कलीगांव के सिपाही प्रताप सिंह, छंदा रेगडू के सिपाही शिवराज सिंह, कमैला के सिपाही केशव दत्त, ज्वाला दत्त, मल्लाकोट के नायक मान सिंह, मल्लाढेक के सिपाही ज्ञान सिंह, भाटीगांव के पायनियर रेवाधर, बुंगली के सिपाही हीरा चंद, रमैला के सिपाही हयात सिंह, सौंज के सिपाही केदार दत्त और मुडिय़ानी के सिपाही प्रहलाद सिंह शामिल हैं।
व्यथा: वीरांगना को नहीं वन रेंक-वन पेंशन के लिए तरस रही
लोहाघाट (चंपावत)। 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में कलीगांव के लांस नायक प्रताप सिंह ने सर्वोच्च शौर्य का प्रदर्शन किया। 69 कुमाऊं आर्मी रेजीमेंट के जवान प्रताप सिंह ने सिर्फ 33 वर्ष में शहादत दी लेकिन शहीद की वीरांगना लक्ष्मी देवी (75) को अतिरिक्त सुविधाएं तो दूर, वन रेंक-वन पेंशन के लिए भी भटकना पड़ रहा है।
15 दिसंबर 1971 को टैंक में विस्फोट होने से कलीगांव के लांस नायक प्रताप सिंह की मौत हो गई थी। शहीद की पत्नी लक्ष्मी की उम्र तब महज 29 वर्ष की थी। कई हफ्ते बाद पति की मौत की सेना द्वारा जानकारी मिली। तब से अब तक पूरे 48 साल तक इस वीरांगना ने अकेले दम पर परिवार की डोर संभाली। उनकी तीन बेटियां हैं।
सबसे बड़ी बेटी हीरा देवी मां लक्ष्मी देवी की सेवा के लिए अपने पति व परिवार सहित गांव में ही रहती हैं। लक्ष्मी बताती हैं कि उन्हें शहादत के एवज में कुछ नहीं चाहिए लेकिन उनका हक तो उन्हें मिलना ही चाहिए। सरकार ने वन रेंक-वन पेंशन का एलान करीब एक साल पहले किया लेकिन इसके बावजूद अभी तक उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। पूर्व सैनिक कल्याण अधिकारी एमएस जोधा का कहना है कि इस मामले में जरूरी कार्यवाही कर शहीद की पत्नी को इंसाफ दिया जाएगा।