प्रसिद्ध देवीधुरा के बग्वाल मेले का स्वरूप धीरे-धीरे बदलने लगा है। वर्ष 2013 के बाद कोर्ट के निर्देश पर युद्ध में पत्थरों के स्थान पर फलों और फूलों का प्रयोग किया जाने लगा है। हालांकि फलों का प्रयोग पत्थर की तरह किए जाने से फल एक ही बार में खत्म हो जाते हैं और उनका स्थान फिर से पत्थर ले लेते हैं।
पत्थरों की बरसात का नजारा बेहद दुर्लभ होता है, जिस समय बग्वाल का आयोजन चरम पर रहता है, ऐसा लगता है मानो आसमान में मधुमक्खियों का झुंड सा उमड़ पड़ा हो। बग्वाल की सबसे खास बात यह है कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा को निभाते आ रहे कोई भी पुजारी घायल नहीं हुए हैं, जबकि पुजारी को बग्वाल में एक मानव के बराबर रक्त बहने की दैवी प्रेरणा मिलने पर पूरे बग्वाल मैदान में घूम-घूम कर बग्वाली वीरों को युद्ध बंद करने के लिए कहना पड़ता है। यही नहीं बग्वाल में घायल होने वाले किसी भी बग्वाली वीर की मौत नहीं हुई है।
बिच्छू घास से होता है बग्वाली वीरों का इलाज
बग्वाल में घायल होने वाले रणबांकुरों का इलाज भी परंपरागत तरीके से किया जाता है। हालांकि वर्तमान में जिला प्रशासन की ओर से बग्वाली वीरों के इलाज के समुचित व्यवस्था की जाती है तथा स्वास्थ्य विभाग का शिविर लगाया जाता है, लेकिन पूर्व में घायल वीरों का इलाज सिन्ने (बिच्छू घास) से किया जाता था, जिसमें रक्तस्राव वाली चोटों में सिन्ने को पीसकर लगाया जाता था, जबकि मामूली रूप से चोटिल वीरों को बिच्छू घास से सहलाया जाता है।
असावधान दर्शक बनते हैं पत्थरों का निशाना
बग्वाल के दौरान दर्शकों को चोटिल होने से बचाने की मेला कमेटी और जिला प्रशासन की ओर से व्यवस्थाएं तो की जाती हैं, बावजूद इसके कई असावधान दर्शक बग्वाली वीरों की ओर से फेंके गए पत्थरों से चोटिल हो जाते हैं। कई बार स्थिति यह होती है कि उत्साही बग्वाली वीरों की ओर से फेंके गए पत्थर दर्शक दीर्घा में गिरकर लोगों को चोटिल कर देते हैं।