चंपावत। जिले में दो ट्रॉमा सेंटरों (आधुनिक सुविधायुक्त आपात चिकित्सा केंद्र) के आलीशान भवन हैं लेकिन दो करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर बनी इन खूबसूरत इमारतों से इलाज नहीं मिल पा रहा है। इन दोनों भवनों को स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित करने के बावजूद इनका उपयोग नहीं हो पा रहा है। वजह न पद स्वीकृत हो सके हैं और न ही उपकरण मिल सके हैं।
इन अस्पतालों में इमरजेंसी उपचार की सुविधा भी नहीं मिल सकी है। जिले के मैदानी हिस्से टनकपुर, राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित लोहाघाट में ट्रॉमा सेंटर बनाए गए। मगर 2.02 करोड़ रुपए की लागत से बने ये केंद्र उपयोग लायक नहीं बन सके हैं जबकि इन दोनों इमारतों का स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरण हुए एक साल से अधिक हो चुका है।
भवन बनने के बाद इनका इस्तेमाल कब हो सकेगा? इस सवाल का उत्तर फिलहाल न स्वास्थ्य विभाग या प्रशासन के पास है और न ही नुमाइंदों के पास। ट्रॉमा सेंटरों का उपयोग न होने की वजह उपकरण से लेकर डॉक्टर आदि पदों का सृजन न होना है। यहां सर्जन, निश्चेतक, न्यूरो सर्जन सहित डॉक्टरों के छह पद और इतने ही पैरा मेडिकल स्टाफ के पद होने चाहिए।
लोहाघाट (चपावत)। पीपीपी अस्पताल परिसर में बना ट्रॉमा सेंटर धन की बर्बादी का नमूना है। 90 लाख रुपए से बने इस ट्रॉमा सेंटर के शुरू न होने से लोगों की अकाल मौतें हो रही हैं। ट्रॉमा सेंटर शुरू होने का लाभ लोहाघाट, बाराकोट, पाटी के अलावा जिले से लगी नेपाल सीमा के लोगों को भी मिलता। और तो और अब इस ट्रॉमा सेंटर के तीन कमरों से पीपीपी अस्पताल का प्रशासनिक कामकाम चलाया जा रहा है।
करीब एक साल पहले ट्रॉमा सेंटर स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित किया गया, मगर इसमें अस्पताल का कार्यालय संचालित हो रहा है। ट्रॉमा सेंटर के शुरू न होने से दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल होने वाले रोगियों को प्राथमिक इलाज के बाद हायर सेंटर भेजना मजबूरी बन गया है। बीते एक साल हुई दुर्घटनाओं में नौ लोग समय पर इलाज न मिलने से दम तोड़ चुके हैं।
चंपावत जिले में अस्पतालों की बहुतायत होने के बावजूद सामान्य इलाज की व्यवस्था भी ठीकठाक नहीं है। ऐसे में ये ट्रॉमा सेंटर बेहद लाभदायक होते। इस वक्त गर्भवती महिलाओं, सड़क हादसे, भूस्खलन, अतिवृष्टि, आपदा आदि मौकों पर पीड़ितों को जिले से बाहर करीब 200 किमी दूर हल्द्वानी, बरेली, दूसरे हायर सेंटर भागना पड़ता है। इसमें असुविधा, धन खर्च होने के अलावा जिंदगी पर खतरा भी बना रहता है। वक्त पर इलाज न मिलने से हर साल 21 से ज्यादा लोगों की मौतें हो रही है।