उच्च न्यायालय नैनीताल की ओर से गंगा और यमुना नदी को जीवित नदियों का दर्जा देकर इनकी स्वच्छता बरकरार रखने की दिशा में क्रांतिकारी कदम बढ़ाया है। लेकिन बड़ी नदियों में गिरने वाली छोटी नदियों का पर्यावरण दूषित होने के साथ ही जैव विविधता लगातार खतरे में पड़ते जा रही है।
छोटी नदियों में मिलने वाले छोटे-छोटे गधेरे प्लास्टिक कचरे के संवाहक बने हुए हैं। आलम ये है कि छोटी नदियों में खुलेआम सीवरेज छोड़ी जा रही है, जो बड़ी नदियों को दूषित कर रहा है। इसके अलावा प्लास्टिक का कचरा और अन्य कूड़ा करकट भी छोटी नदियों के माध्यम से बड़ी नदियों तक पहुंच रहा है।
चंपावत जिला मुख्यालय में गंडक नदी, नागनी नदी के साथ ही करीब आधा दर्जन से अधिक छोटे-छोटे गधेरे हैं, जो गंदगी के शरणगाह बन रहे हैं। देखरेख नहीं होने के कारण नागनी और गंडक नदी का जल स्तर भी लगातार गिर रहा है।
दूसरी ओर विभिन्न नदियों में बने श्मशान घाटों में पानी का प्रवाह कम होने के कारण शवदाह के बाद बची अधजली लकड़ियां को यूं ही छोड़ दिया जाता है। इससे भी नदियों का पानी लंबे समय तक प्रदूषित रहता है। लोहाघाट की लोहावती नदी का जल स्तर रसातल में पहुंच गया है। जिस कारण नदी में अधिकांश स्थानों पर प्लास्टिक के कचरे के ढेर लगे हैं।
नदी का प्रदूषित पानी फिर से फिल्टर कर पीने के पानी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लोगों का कहना है कि छोटी नदियों में छोड़े जा रहे प्लास्टिक के कचरे को रोकने के लिए कड़े कानून प्रावधान अमल में लाने होंगे, तब ही नदियों को प्लास्टिक के ढेर में तब्दील होने से बचाया जा सकेगा।