चंपावत का संस्कृत विद्यालय भवन।
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प्रदेश सरकार निजी स्कूलों में संस्कृत शिक्षा को अनिवार्य करने जा रही है। शिक्षा मंत्री ने इससे संबंधित शासनादेश जारी करने के 17 सितंबर को आदेश दिए थे। इसके बाद निजी स्कूलों में तो संस्कृत शिक्षा अनिवार्य हो जाएगी।
जिन सरकारी स्कूलों में पहले से ही संस्कृत शिक्षा दी जा रही है, वहां के हालात कतई उत्साहजनक नहीं है। जिले के 35 राजकीय इंटर कॉलेज में आधे से अधिक स्कूलों में संस्कृत के प्रवक्ता ही नहीं है।
चंपावत जिले के 61 जीआईसी में से 35 स्कूलों में इंटर में संस्कृत विषय है। इन 35 जीआईसी में महज 17 कॉलेजों में ही संस्कृत के प्रवक्ता हैं। 18 कॉलेजों में संस्कृत विषय पढ़ाने के लिए कोई भी शिक्षक नहीं है। ऐसे में संस्कृत को कॅरिअर बनाने वाले छात्रों के पास कोई विकल्प नहीं है। जीआईसी ही नहीं, जिले के दो संस्कृत विद्यालयों के भी हाल अच्छे नहीं है।
देवीधुरा संस्कृत महाविद्यालय में 50 छात्र हैं। प्रधानाचार्य डॉ. बीसी जोशी ने बताया कि 2009 से अब तक यहां के 42 छात्र मेरिट में आए हैं। बावजूद इसके यहां शिक्षकों की पर्याप्त तैनाती नहीं हुई है।
राज्य अनुदान से दो ही शिक्षक हैं जबकि चार शिक्षकों को राष्ट्रीय संस्कृत शिक्षा संस्थान नई दिल्ली के जरिए मानदेय पर रखा गया है। फिर भी शिक्षकों की कमी बनी हुई है। चंपावत के संस्कृत विद्यालय में भी स्टाफ और दूसरे संसाधनों की कमी से सात साल में 51 छात्र कम हो गए हैं। अब यहां सिर्फ 14 छात्र हैं।
जिले के 18 जीआईसी में संस्कृत विषय के प्रवक्ताओं के पद रिक्त हैं। इन पदों को भरने के लिए उच्चाधिकारियों से आग्रह किया गया है। जिले के दो संस्कृत विद्यालयों के संसाधन मुहैया कर स्थिति में सुधार के भी प्रयास किए जा रहे हैं।
आरसी पुरोहित, सीईओ, चंपावत।