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कांग्रेस में बगावत बनी हार का कारण

Sat, 11 Mar 2017 10:46 PM IST
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, चंपावत
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चंपावत विधानसभा सीट से दो बार विधायक रहे हेमेश खर्कवाल को मौजूदा चुनाव में बड़े अंतर से हार का घूंट पीना पड़ा। उन्हें न केवल पहाड़ पर शिकस्त मिली, बल्कि गृह इलाके के वोटरों का भी विश्वास वे नहीं जीत सके। विकास के दावे भी धराशायी रहे।
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वहीं चुनाव के ऐन मौके पर संगठन में बगावत और जिलाध्यक्ष मोहन राम सहित पार्टी के सात कद्दावर नेताओं के भी भाजपा में जाने से उनकी स्थिति कमजोर रही। इसके अलावा चार प्रत्याशियों वाले चंपावत में तीसरा दमदार उम्मीदवार न होना भी बड़ी हार की मुख्य वजह रहा। दो अन्य प्रत्याशियों को मिलाकर दो हजार से भी कम वोट मिले।

चंपावत सीट पर भाजपा से पहली बार मैदान में उतरे कैलाश चंद्र गहतोड़ी ने कांग्रेस को 17360 वोटों से करारी शिकस्त दी। जीत का ये अंतर अब तक के तीनों चुनाव की कुल मिलाकर 14408 के विजयी अंतर से भी ज्यादा है। भाजपा हर राउंड में आगे रही।
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लगातार चौथे चुनाव में मैदान में उतरे कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ जबर्दस्त एंटी इनकंबैंसी रही। कांग्रेस का कहना है कि बीते पांच वर्षों में जिला अस्पताल, राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज, दो राजकीय पॉलीटेक्निक, दो डिग्री कॉलेज, एक उप तहसील गठन, चंपावत नगर पंचायत को अपग्रेड कर पालिका एवं बनबसा नगर पंचायत का गठन, चंपावत पेयजल पुनर्गठन योजना की शुरुआत, सूखीढांग-डांडा-मीडार मोटर मार्ग सहित बीस से अधिक विकास कार्य शुरू किए थे, लेकिन इन विकास कार्यों के दावों को जनता ने नकार दिया।
कांग्रेस को न केवल पहाड़ में बल्कि मैदानी क्षेत्र टनकपुर-बनबसा में भी पिछड़ना पड़ा। यहां तक कि मुस्लिम मतदाताओं में भी कांग्रेस के प्रति विश्वास कम हुआ। कांग्रेस की यह हार विधायक की कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवाल उठाती है। विकास के बावजूद विधायक लोगों से जुड़ नहीं सके। इसकी वजह से आम जनता की उनसे दूरी रही। जिला पंचायत सदस्य विमला सजवान, उषा गुरंग, पूर्व ब्लॉक प्रमुख बहादुर फर्त्याल, भेषज संघ अध्यक्ष सज्जन वर्मा सहित पार्टी संगठन के बड़े पदाधिकारियों ने चुनाव के एलान के बाद कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा। इससे पार्टी के संगठन की कमर टूटी और खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ा।

वहीं भाजपा के विजयी प्रत्याशी कैलाश चंद्र गहतोड़ी द्वारा बीते दो वर्षों में किए गए सामाजिक काम ने जीत में बढ़-चढ़कर योगदान किया। इसके अलावा पार्टी के प्रति चली हवा ने भी जीत को धमाकेदार बनाने में भूमिका निभाई।



कांग्रेस पहली बार जिले से साफ होने की राह पर
उत्तराखंड विधानसभा के चौथे चुनाव में चंपावत जिले से पहली बार कांग्रेस की नुमाइंदगी नहीं रहेगी। हालांकि, अभी लोहाघाट सीट का नतीजा औपचारिक तौर पर घोषित नहीं किया गया है और यहां 567 वोट वाले कर्णकरायत के एक बूथ की गिनती होनी है। भाजपा के 489 वोट से आगे होने और कर्णकरायत के भाजपा के प्रभाव वाला इलाका होने से भाजपा अपनी जीत को तय मान रही है। वैसे भी उसे इस बूथ पर अगर 40 वोट भाजपा को मिल जाएं, तो उसकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी। इन समीकरणों के मद्देनजर यहां की दोनों सीटों से हाथ साफ हो गया है। ऐसे में भाजपा की चंपावत के साथ लोहाघाट दोनों सीटों पर जीत का परचम फहराना तय है। भाजपा ने राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में जिले की दोनों सीटों पर मिली पराजय का बदला ले लिया।

उत्तराखंड के 2002 में हुए पहले चुनाव में चंपावत और लोहाघाट दोनों सीटों पर कांग्रेस काबिज हुई। 2007 में लोहाघाट से कांग्रेस एवं चंपावत से भाजपा को जीत मिली, जबकि 2012 के चुनाव में लोहाघाट से भाजपा और चंपावत से कांग्रेस प्रत्याशी विजयी रहे थे। अब मौजूदा चुनाव में पहली बार भाजपा को दोनों सीटों पर जीत मिली है। भाजपा जिलाध्यक्ष हिमेश कलखुड़िया का कहना है कि पार्टी ने दोनों सीटों पर टीम वर्क के साथ काम किया।
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