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रामचंद्र चौड़ाकोटी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी।

Mon, 09 Jan 2017 11:14 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत।
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रामचंद्र चौड़ाकोटी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। - फोटो : अमर उजाला
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चंपावत। सूखीढांग क्षेत्र के नामी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी में देश को आजाद करने की जबर्दस्त ललक थी। एक जनवरी 1914 को किसान परिवार में जन्मे रामचंद्र के जुनून ने दो बार जेल में भी अनशन किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 50 रुपए के अर्थदंड के अलावा अल्मोड़ा से लेकर बरेली तक जेल की यात्राएं की। प्राइमरी से आगे की पढ़ाई के लिए खेतीखान गए रामचंद्र काली कुमाऊं के शेर पंडित हर्षदेव ओली के संपर्क में आए। उनकी प्रेरणा ने युवा चौड़ाकोटी में जोश भरा, वे जंग-ए-आजादी में शरीक हो गए। 28 साल की उम्र में उन्होंने देवीधुरा में विशाल प्रदर्शन किया।
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अंग्रेजों ने दो हफ्ते बंद रखने के बाद उन्हें छोड़ा। भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ जंग को धार देने के लिए उन्होंने कांग्रेस मंडल चौड़ाकोट संगठन बनाकर श्यामलाताल में संघर्ष छेड़ा। उन्होंने डांडा, बुड़म जैसे दूरस्थ इलाकों में जन-जागृति की। अंग्रेजों को पहाड़ की ओर बढ़ने से रोकने के लिए चल्थी पर मार्ग अवरुद्ध करने की योजना दियूरी में अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार करने से विफल रही। गोरलचौड़ मैदान की अस्थायी जेल में रखने के बाद छह अन्य सेनानियों के साथ उन्हें भी सजा सुनाई गई। जुर्माने के साथ चौड़ाकोटी को अल्मोड़ा जेल भेजा गया। जेल में भी आंदोलन जारी रखने के चलते अंग्रेजों ने उन्हें बरेली जेल भेजा।

स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी ने आजादी की जंग ही नहीं, इलाके के विकास के लिए भी जंग लड़ी। उनके बेटे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के जिलाध्यक्ष महेश चौड़ाकोटी बताते हैं कि 1948 में साधन सहकारी समिति के सभापति, वमनजौल के सरपंच, ज्येष्ठ उप प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने समेत 10 जनवरी 2001 में आखिरी सांस तक वे लगातार इलाके की तरक्की के लिए लगे रहे। रामचंद्र सहित सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद में धुरा में 2013 में सेनानी स्मारक बनाया गया। पिछले साल सूखीढांग जीआईसी का नाम उनके नाम पर रखा गया।
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