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राखी की राखी बनीं चीन की राखियों का विकल्प

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महिला समूहों द्वारा निर्मित राखियों का चंपावत में मुआयना करते एसडीएम, एपीडी और अन्य अधिकारी। - फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। राखी का काउंटडाउन शुरू हो गया है। बस सात दिन दूर। तीन अगस्त को राखी के पर्व केे लिए इस बार बाजार में चीन की राखियां गायब है। व्यापारियों द्वारा चीन के सामान के बहिष्कार के क्रम में ये नजारा सामने आया है। वहीं इनका स्थान लिया है महिला स्वयं सहायता समूहों ने। महिलाओं द्वारा निर्मित राखियों की खूब धूम है। स्वदेशी के अलावा सस्ती होने के साथ ही इनकी भव्यता भी कम नहीं है।
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यह समूह चार हजार से अधिक राखी बना चुकी हैं। समूहों के नोडल अधिकारी ग्राम विकास अधिकारी जीवन गिरी बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद मई में इन समूहों का गठन किया गया है। धागे से निर्मित इन खूबसूरत राखियों को एसएसबी, आईटीबीपी, पुलिस और बैंक के कर्मियों के साथ ही आम लोगों को बेचा जा रहा है। ज्योति समूह आमबाग की अध्यक्ष राखी चंद बताती हैं कि अब तक डेढ़ हजार राखी की मांग आई है। एक हफ्ते में तीन हजार राखियां बनाई गई हैं। संदर्भदाता राधा चौहान, भावना चंद व मोहिनी चंद ने सहयोग किया है। एक राखी को बनाने में करीब पांच रुपये की लागत आ रही है। जबकि बिक्री दस रुपये में की जा रही है। ज्योति समूह के अलावा जय मां पूर्णागिरि, दिया समूह, जय ईष्ट देव, अन्नपूर्णा और एकता समूह की 60 महिलाएं इस काम में हाथ बंटा रही है।
प्रशासनिक अफसरों ने थपथपाई पीठ
चंपावत। समूहों द्वारा तैयार राखियों की विकास भवन में प्रदर्शनी भी लगाई गई। प्रदर्शनी में सहायक परियोजना निदेशक विम्मी जोशी, एसडीएम अनिल गर्ब्याल, बीडीओ केके पांडेय, एबीडीओ बीबी जोशी आदि ने महिलाओं के प्रयास की सराहना की।
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