चंपावत। सांस्कृतिक एवं साहित्यिक चेतना मंच के तत्वावधान में रविवार को काव्यगोष्ठी हुई। जन कवि प्रकाश चंद्र जोशी शूल ने कहा-कल तक खुश थे जो निहार-निहार, निज राजनीति का राज सिंहासन, हैरत में हैं आज वही लगा देख उत्तराखंड राज्य में राष्ट्रपति शासन।
डा.भुवन चंद्र जोशी ने कहा-अब मैं तिरस्कृत होकर अपमान की पीड़ा ढो रहा हूं, अपने को ही छलकर न जाने क्यों? व्यर्थ ही रो रहा हूं, डा.कीर्ति बल्लभ सक्टा ने कहा-समय यहां आगे बढ़ा, आया नव मधुमास, हिमांशु जोशी ने कहा-आई होली सबबने, जैसे कोई मलंग, रावत के चेहरे का, फीका पड़ गया रंग, योगेश पुनेठा ने कहा-कभी बारिश की बूंदों को छू कर देखा है, हथेली को मैने भी हवा में हिलाकर देखा है।
सुभाष जोशी ने अपने भाव यूं पेश किए-जाग सके तो जाग सखा, माया ममता त्याग सखा, डा.विष्णु दत्त भट्ट सरल ने कहा-बदतर होने लग गया, राजनीति का हाल, नहीं समझ में आ रही, नेताओं की चाल, बीडी फुलारा ने कहा-खबरदार! बा अदब बा मुलाहिजा होशियार, इंसानियत पर कभी न करना वार, पुष्कर बोहरा सच्चे मन से जब वृक्षारोपण अभियान चलाओगे, तब जितने पेड़ लगाओगे उतना ही पुण्य कमाओगे।
अंजू पांडेय ने कहा कि अबीर-गुलाल सब मल रहे, इक दूजे के अंग, मन ही मन फूटे रहे, लड्डू किसके संग, फणींद्र कुमार पांडेय ने कहा-सांसदों के हल्ले से फूटते जहां दर्शकों के कान, चलते जहां बेहिचक जूते-चप्पल यों छाती तान के जरिए मौजूदा हालात में व्यंग कसा। डा.बीडी फुलारा की अध्यक्षता और डा.बीसी जोशी के संचालन में हुई गोष्ठी में राम प्रसाद आर्य, बबीता जोशी, कमला जोशी, इंद्र लाल वर्मा आदि मौजूद थे।