साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना मंच के तत्वावधान में रविवार को काव्य गोष्ठी हुई, जिसमें शिक्षक फणींद्र कुमार पांडेय ने कहा-पाक कभी हो नहीं सकता यों सगा, देता आया ये सदा-सर्वदा हमें दमा। बबीता जोशी ने अपने भाव यूं रखे-हादसों से जिंदगी कुछ संवर सी गई है, जमीन पर रह कर आसमां छूने में वक्त तो लगता है।
रिटायर्ड प्रधानाचार्य डा.तिलकराज जोशी ने कहा-बीते युग की सुधि से रे मन, युवा बने रहना सीखो तुम, पुष्कर बोहरा ने कहा-राह का पत्थर कभी न बनना, सबकी ठोकर खाओगे। भव्य मूर्ति बनो मंदिर की, श्रद्धा से पूजे जाओगे, जनकवि प्रकाश चंद्र जोशी शूल ने कहा-तुम आन-काथ कौ, मैं हुंगरा द्यूंन। तुम काथ-बात कौ, मैं हुंगरा द्यूंन, हिमांशु जोशी ने-हम प्रेम, शांति और मानवता का उनको पाठ पढ़ाते हैं, जो धर्म-ओ-जिहाद के नाम पर युवाओं को भड़काते हैं, बाल कवि आकाश ने धरती से उछला गगन में चमका संदेश है, हजारों सितारों में चमक रहा मेरा देश है, जगदीश चंद्र पाटनी ने रुपया-पैसा धन-दौलत का खेल हो गया बड़ा रे भैय्या, योगेश चंद्र पुनेठा ने हमारी फकीरी का मजाक ना उड़ाया जाए, हमारे ही जख्मों को दिखाकर हमें ना जलाया जाए, पेश किया।
गोष्ठी में राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता डा.भुवन चंद्र जोशी, रामप्रसाद आर्य, डा.विष्णु दत्त भट्ट सरल, सिद्धार्थ अधिकारी, मयंक भट्ट, कमला जोशी आदि ने भी कविता पाठ किया।