चंपावत। टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग में स्वांला के पास जोरदार आवाज के साथ मैक्स सुबह 5.50 बजे जीप गहरी खाई में जा समाई। कुछ देर तक वाहन के लुढ़कने की खौफनाक आवाज पहाड़ियों से टकराने के बाद सन्नाटे में बदल गई। खामोशी भी ऐसी, जिसने दुर्घटनास्थल को मरघट में तब्दील कर दिया। एक झटके में दस लोग मौत के मुंह समा गए। हादसे वाली जगह का मंजर ऐसा था कि देखने वालों की रूह कांप उठे। चार सौ मीटर से अधिक गहरी खाई में सभी दस यात्रियों की लाशें बिखरी हुई थी।
दुर्घटना के बाद करीब सुबह 6.30 बजे राहत अभियान को शुरू करने के लिए गहरी खाई में उतरना जान-जोखिम में डालने से कम नहीं था। विश्राम घाट मंदिर के समीप से दुर्घटना स्थल में गहरी खाई में जाने के लिए रास्ता नहीं था। घास और पत्थर की नोकों को पकड़ कर उतरना व चढ़ना जान जोखिम में डालने जैसा था। लेकिन इन बचाव कर्मियों ने अपनी जान की परवाह नहीं की। दूसरा रास्ता म्वाला गांव से था, जहां तक पहुंचने के लिए एक किमी सड़क के बाद चार किमी पैदल दूरी तय करनी थी।
दुर्घटना स्थल में करीब 300 मीटर की परिधि में क्षत-विक्षत शव बिखरे पड़े थे। करीब 200 मीटर नीचे एक महिला, बच्चे और दो पुरुषों के क्षत-विक्षत शव पहाड़ी में अटके हुए थे। इससे आगे के 200 मीटर नीचे दुर्घटनास्थल तक वाहन के समीप बाकी छह शव अलग-अलग जगह बिखरे हुए थे।
खड़ी चढ़ाई में अटके शवों को एकत्र करना बचाव कर्मियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रही। कड़ी मशक्कत के बाद इन शवों को एक-एक कर म्वाला गांव के रास्ते सड़क तक पहुंचाया गया। अपराह्न एक बजे अंतिम शव को सड़क पर पहुंचाए जाने के बाद बचाव कार्य समाप्त हुआ।
घास और पत्थर पकड़कर घटना स्थल पर पहुंचे
चल्थी चौकी प्रभारी पीआर विश्वकर्मा के नेतृत्व में कांस्टेबल दीपक कापड़ी, प्रहलाद सिंह, शौकीन और अनिल बिष्ट ने विश्राम घाट से बेहद तीखे ढलान पर घास और पत्थरों को पकड़ कर दुर्घटनास्थल पर पहुंच कर दिलेरी के साथ राहत अभियान चलाया।
तीखे ढलान में उतरने व शवों को निकालने के लिए रस्सों की मदद ली। जीप गिरने वाले स्थान में रस्सी बांधने के लिए जेसीबी की मदद ली गई। एनएच के जेसीबी में रस्से बांध कर आपदा राहत और बचाव कर्मचारी जरूरी उपकरणों के साथ गहरी खाई में उतरे।
टूटकर तीन हिस्सों में बंटी जीप
चार सौ मीटर गहरी खाई में समाए वाहन के टुकड़े-टुकड़े हो गए। वाहन की छत टूट कर एक तरफ पड़ी हुई थी। जबकि चेसिस एक तरफ और उससे दस मीटर नीचे बुरी तरह पिचकी बॉडी दुर्घटना की दास्तां बया कर रही थी। एनएच पर चल रहे निर्माण कार्य की वजह से हादसे से चंद मीटर की दूरी पर स्थित मंदिर के पुजारी भुवन चंद्र मुरारी जीप गिरने की आवाज नहीं सुन सके। एक कार चालक ने जब छह बजे उन्हें हादसे की जानकारी दी, तो वे टार्च के सहारे दुर्घटनास्थल पर वाहन गिरने के निशान को देखने में कामयाब हो सके।
ग्रामीणों ने दिखाया गजब का हौसला
दुर्घटना स्थल का मंजर बेहद खौफनाक था। यात्रियों के शव जगह-जगह बिखरे हुए थे। जगह-जगह जमा खून व मांस के टुकड़े शरीर में सिहरन पैदा कर रहे थे। इन सबके बाद भी बचाव कर्मियों और स्थानीय लोगों ने गजब का हौसला दिखाया। अग्रिशमन, पुलिस, आपदा प्रबंधन, एनएच के मजदूरों और स्थानीय लोगों ने मिलकर गहरी खाई से शवों को सड़क तक पहुंचाया। प्रभारी कोतवाल आरएस डांगी, कांस्टेबल महिमन सिंह, शाकिर आपदा प्रबंधन के रामदत्त, त्रिभुवन, अर्जुन, देव चंद्र और चतुर सिंह, एनएच के मेट हेतराम, डिकरदेव, उमेश चंद्र, चिंतामणि और ग्रामीण इंद्र देव, मिलाप सिंह, जीवन चंद्र, जगदीश चंद्र, किशोर चंद्र, ईश्वर, शंकर और कीर्ति बल्लभ ने अहम भूमिका निभाई।