पिथौरागढ़। पहाड़ में खेले जाने वाले पारंपरिक खेल अब विलुप्ति की कगार पर हैं। गांवों में जहां दो दशक पहले बच्चे पारंपरिक खेलों में व्यस्त नजर आते थे अब मोबाइल गेम या फिर टीवी से चिपके नजर आते हैं। इस कारण उनका शारीरिक और मानसिक विकास भी प्रभावित हो रहा है। इन खेलों को बचाने के लिए सरकार की ओर कोई प्रयास नहीं जा रहे हैं।
पहाड़ों में जब, टीवी, मोबाइल का वर्चस्व नहीं था तब बच्चे पारंपरिक खेल पिड्डू, अड्डू, गिल्ली- डंडा, लुका छिपी, चुप्पी, पानपत्ती, गोट्टी, कुनिया, बाघ बकरी सहित कई अन्य खेल खेलते थे। लेकिन वर्तमान दौर में इन खेलों को शायद ही कोई बच्चा जानता है। अब बच्चे मोबाइल गेम, टीवी, लैपटॉप में व्यस्त रहते हैं। शारीरिक खेलों का अभ्यास नहीं होने से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पा रहा है। मोबाइल गेम के कारण उनकी आंखों पर भी प्रभाव पड़ रहा है। अगर पुराने खेलों को बचाना है तो सरकार को सरकारी स्कूलों से पहल करने की आवश्यकता है।
गोट्टी और अड्डू से बच्चे सीखते थे संख्या ज्ञान
पिथौरागढ़। पहाड़ों में खेले जाने गोट्टी और अड्डू खेल से बच्चे संख्या ज्ञान भी सीखते थे। क्योंकि इन दोनों खेलों में गणना का प्रयोग किया जाता था। कोरोना काल में जब सब अपने घरों में कैद हो गए थे। उस दौरान कुछ घरों की छतों और आंगन पर बच्चे खेलते हुए नजर आए थे। लेकिन अब शायद ही ये खेल कहीं देखे जाते हैं। संवाद
पारंपिरक खेलों को बचाना जरूरी है। विद्यालयों में समय-समय पर पुराने खेलों का आयोजन होना जरूरी है। गांव घरों में खेले जाने वाले परंपरागत खेल बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में सहायक होते थे।
हरि दत्त कापड़ी, अर्जुन अवार्ड प्राप्तकर्ता।