च्यूरानी हादसे के बाद मिर्तोली की रोती-बिलखती महिला को सहारा देता ग्रामीण।
- फोटो : अमर उजाला
मिर्तोली गांव में रविवार शाम को कहीं भी चूल्हे नहीं जला। गांव में हर व्यक्ति की आंख नम है और हादसे का जिक्र होते सब्र का बांध भी टूट जा रहा है। बुजुर्ग तक हिचकियां लेकर रो रहे हैं। ऐसा हो भी क्यों न। एक ही हादसे में गांव के सात परिवारों से रोजी रोटी का इंतजाम करने वाले जो चले गए।
मुख्यालय से करीब 21 किलोमीटर दूर मिर्तोली गांव में रविवार को एक ही अर्थी उठी थी। उस समय इस गांव ने सोचा नहीं था कि एक और आपदा उनका इंतजार कर रही है। च्यूरानी के पास हादसे की सूचना मिली तो गांव बदहवासी में डूब गया। कई महिलाएं तो सारे काम छोड़कर मौके पर ही जा पहुंची। शाम को गांव भी एक गहरे दुख में डूब गया। गांव में गहराती शाम में गाय और भैंसों के रंभाने, किसी कोने से उठती गीत की टेर की जगह रह रह कर सन्नाटे को तोड़ती कोई चीख, किसी का विलाप करता करुण स्वर ही सुनाई दे रहा है। गांव के प्रधान लक्ष्मी दत्त जोशी भी अपना रोना किसी तरह से नहीं रोक पा रहे हैं। घटना का जिक्र होते ही उनकी आवाज रुंध गई।
प्रधान के मुताबिक काल का ग्रास बने अधिकतर लोग अपने परिवारों की रोजी रोटी का सहारा था। मुआवजा मिल भी गया तो जो चला गया उसकी भरपाई कैसे होगी। 42 साल के तारादत्त जोशी की इसी हादसे में मौत हुई। तारादत्त के पिता नारायण दत्त जोशी गुमसुम हैं। जवान बेटे की मौत ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया।
प्रधान के मुताबिक यह मेहनत मजदूरी कर जीवन यापन करने वालों का गांव है। काल के ग्रास बने अधिकतर लोग अपने परिवारों का सहारा भी थे। किसी के परिवार में छोटे-छोटे बच्चें हैं तो किसी के परिवार में अब कमाने वाला ही कोई नहीं रहा।