चंपावत। जिले के पहाड़ी हिस्से के कई गांवों में जंगली जानवरों के कारण जहां खेती प्रभावित होती जा रही है, वहीं कई गांवों में मूंगफली का उत्पादन पूरी तरह से बंद हो गया है। दूसरी ओर जिले के मैदानी भाग टनकपुर, बनबसा में जंगली हाथियों के उत्पात से किसानों की परेशानी बढ़ती जा रही है, लेकिन राज्य में होने जा रहे चौथी विधानसभा चुनाव के मैदान में खड़े राजनीतिक दलों के एजेंडे में जंगली जानवरों की समस्या शामिल ही नहीं है। जिले के पर्वतीय भूभाग में जंगली जानवरों के कारण मूंगफली के उत्पादन के लिए बनी कई गांवों की पहचान अब समाप्त हो रही है। यही नहीं जंगली जानवरों की समस्या कई गांवों में पलायन का प्रमुख कारण भी बन रही है।
एक दशक पहले तक जिले के पाटी ब्लॉक के चौड़ागूंठ, सिल्योड़ीगूंठ, गागर, मनटांडे, बनौली, बिरोली, चमतोला, कानीकोट, मूलाकोट, पटनगांव, बसान, बांस, डूंगराकोट, बस्बाड़ी आदि गांवों की पहचान प्रमुख मूंगफली उत्पादक गांवों के रूप में होती थी। प्रगतिशील किसान विक्रम सिंह बताते हैं कि इन गांवों की बालू, दोमट मिट्टी में मूूंगफली का व्यापक उत्पादन होता था, यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का मुख्य साधन होती थी, लेकिन जंगली जानवरों विशेषकर सुअरों के झुंडों ने यहां के मूंगफली किसानों के मुंह का निवाला छीन लिया। उनका कहना है कि इन गांवों में अब मक्का के साथ दलहनी फसलों की खेती भी पूरी तरह चौपट हो गई है।
मूंगफली उत्पादक रमेश सिंह, शिवराज सिंह, राम सिंह, माधो सिंह, विशन सिंह, दीवान सिंह, शेर राम, प्रेम सिंह, मोहन सिंह, केशर सिंह आदि का कहना है कि जंगली सुअरों से खेती को निजात दिलाने के लिए वे लगातार शासन से फरियाद करते रहे हैं, लेकिन किसी ने उनकी समस्या गंभीरता से नहीं सुनी।
नतीजतन उन्होंने मूंगफली आदि तिलहनी, दलहनी फसलों की खेती करना ही छोड़ दिया। इस बारे में उन्हें न तो कोई मुआवजा ही मिला और नहीं कोई अन्य सरकारी प्रोत्साहन। रेंजर बृजमोहन टम्टा का कहना है कि सरकार की ओर से खेती किसानी को नुकसान पहुंचाने वाले सुअर जैसे जंगली जानवरों को मारने के नियम बनाए हैं। किसान चाहे तो नियमों का पालन करते हुएसुअरों को मारा जा सकता है।
चंपावत। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सुअर, हाथियों के झुंड फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, वहीं नगरीय क्षेत्रों में लावारिस जानवरों, बंदरों का खौफ है। नगर निकायों की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर बंदरों को पकड़ने, लावारिस जानवरों को गोसदनों में भेजा जाता है, लेकिन कुछ ही दिनों में बंदर, लावारिस जानवर फिर से आबादी में घूमने लगते हैं।