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तो निपट चुकी होती पटवारी लिखित परीक्षा

Sun, 27 Dec 2015 10:06 PM IST
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, चंपावत
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तारीख 27 दिसंबर, दिन रविवार और इस दिन राजस्व उप निरीक्षक (पटवारी) की लिखित परीक्षा निपट चुकी होती, मगर इस दिन तक यह इम्तिहान होना तो दूर, आवेदन पत्र जमा करने की तिथि भी खत्म नहीं हुई है। और ये सब हुआ है पटवारियों की परीक्षा कार्यक्रम में हुए बदलाव के चलते। परीक्षा कार्यक्रम में दो बार तिथि बढ़ाने से लेकर अब तक ढेरों संशोधन किए जा चुके हैं।
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पटवारी भर्ती परीक्षा को एक नहीं, तीन विज्ञप्ति निकल चुकी है। आठ अक्तूबर के बाद दो बार (19 नवंबर और 22 दिसंबर) को संशोधित विज्ञप्ति निकाली गई। सबसे पहले यह लिखित परीक्षा 27 दिसंबर को होनी थी। इसके बाद इसे 20 मार्च 2016 और फिर 22 मई किया गया। केवल परीक्षा तिथि ही नहीं बदली, फार्म जमा करने की तिथि में भी संशोधन किया गया।

शुरू में आवेदन जमा करने की तारीख 10 नवंबर थी, जिसे बढ़ाकर 30 नवंबर किया गया। फिर फार्म जमा करने की अंतिम तिथि 30 नवंबर के बजाए 31 दिसंबर किया गया, जबकि इस दौरान 30 नवंबर तक आए फार्मों की जांच भी पूरी की जा चुकी थी और इस जांच में 188 आवेदन पत्र निरस्त भी किए जा चुके थे। परीक्षा नियंत्रण कक्ष के मुताबिक 30 नवंबर तक आए 1656 आवेदन पत्रों में शनिवार तक मात्र एक फार्म बढ़ा है और तो और पदों की संख्या भी 21 से बढ़कर 31 कर दी गई है। जिला प्रशासन का कहना है कि परीक्षा की निष्पक्षता और अधिक से अधिक युवाओं को इसमें शामिल करने के लिए शासन द्वारा संशोधन किए गए हैं।
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शारीरिक दक्षता परीक्षा के मानक भी बदले गए
केवल परीक्षा तिथि, आवेदन पत्र जमा करने की तारीख या ऐसे ही अन्य परिवर्तन नहीं हुए, बल्कि कई दूसरे बदलाव भी किए गए। शारीरिक दक्षता के लिए दौड़ की दूरी को भी दो बार संशोधित किया गया है। शारीरिक दक्षता के लिए पुरुष अभ्यर्थियों को मूल विज्ञप्ति में एक घंटे में 10 किलोमीटर दौड़ना था, जबकि इसमें दो बार संशोधन किया गया। पहले इसे कम कर 9 किमी और अब 7 किमी कर दिया गया है। इसी तरह महिलाओं के लिए 35 मिनट में 5 किमी से 4.5 किमी और अब 3.5 किलोमीटर कर दिया गया है।

वन आरक्षी परीक्षा में अंगुलियां उठने के बाद से नौजवानों में मन में आशंकाएं हैं और अब राजस्व विभाग की परीक्षा में कई बार हुए बदलाव से युवा चिंतित हैं। जिले से लेकर प्रदेश स्तर तक परीक्षा आयोजन के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष प्रणाली विकसित हो, जिससे किसी तरह का शक और बार-बार संशोधनों की नौबत न आए। -मंदीप ढेक, राज्य आंदोलनकारी।
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