वैसे तो फार्मेसिस्टों को भी शेड्यूल-एच की दवाओं के वितरण का हक नहीं है, लेकिन स्वांला के अस्पताल की विडंबना देखिए। मुख्यालय से करीब 22 किमी दूर टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग के इस राजकीय एलोपैथिक अस्पताल में तो मरीजों की नब्ज टटोलने से लेकर दवा देने तक का काम वार्डब्वाय को करना पड़ रहा है। कम से कम मंगलवार को तो इस अस्पताल का सच यही था। डॉक्टर अस्पताल में नहीं थे। वहीं फार्मेसिस्ट भी अस्पताल से नदारद मिले।
बुजुर्ग डिगर देव तीन किमी पैदल चलकर स्वांला अस्पताल में इलाज की उम्मीद से पहुंचे, लेकिन उन्हें न डॉक्टर मिले और न ही फार्मेसिस्ट। अस्पताल में अकेले वार्डब्वाय खीम सिंह बिष्ट ड्यूटी पर मुस्तैद थे। यहां तक कि उन्हें अपने असल काम के साथ ही मरीजों का इलाज भी करना पड़ रहा था। डिगर देव को भी खीम सिंह ने ही मर्ज पूछकर दवा दी। इससे पहले एक महिला सहित पांच दूसरे मरीजों के लिए भी वे ही डॉक्टर बने। मई में यहां 290 मरीजों का पंजीकरण हुआ, जबकि जून में अब तक 115 लोग इलाज की उम्मीद के साथ अस्पताल में दस्तक दे चुके हैं, लेकिन इनमें से काफी लोगों का डॉक्टर नहीं अस्पताल के दूसरे कर्मियों ने इलाज किया। इस वजह से चार बैड के इस अस्पताल की हालत बस खानापूरी रह गई है।