होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति असरकारक, सस्ती और साइड एफेक्ट रहित है। इसके बावजूद डा. सैमुयल हैनीमेन द्वारा शुरू की गई इस चिकित्सा विधा की पहुंच आम जन तक नहीं हो पा रही है। होम्योपैथी इलाज आम लोगों तक पहुंचाने का नेटवर्क बेहद लचर है। अस्पतालों की कमी से लेकर दवाओं का अभाव बड़ा रोड़ा बना हुआ है। जिले में मात्र पांच अस्पताल हैं लेकिन एक के पास भी अपना भवन नहीं है।
जिले में होम्योपैथी के मरीजों की तादाद बढ़ने के बजाय लगातार घट रही है। चार वर्ष में मरीजों की संख्या 1513 कम हो गई है। जिला होम्योपैथी अधिकारी डा.सूरवीर सिंह सजवाण का कहना है कि एलर्जी और त्वचा सहित कई रोगों में होम्योपैथी बेहद कारगर है। इसके अलावा यह नवजात, बूढ़े लोगों और गर्भवती रोगियों के लिए भी फायदेमंद है। मस्से, पथरी, टांसिलाइटिस में भी कारगर है। जबकि एलोपैथ में इसके लिए सर्जरी जरूरी है।
फिर भी आम लोगों के बीच इस पैथी की जानकारी काफी कम है। वजह विभाग का ढीलाढाला ढांचा है। जिले में होम्योपैथी इलाज एलोपैथिक अस्पतालों में चल रहे हैं। सभी पांचों अस्पताल में मरीजों को देखने के लिए होम्योपैथी डॉक्टर तो हैं, लेकिन बाराकोट में फार्मेसिस्ट का पद खाली है। वहीं जिला होम्योपैथी कार्यालय में विभागाध्यक्ष के अलावा एक मात्र बाबू है। अलबत्ता तीन पद आअट सोर्सिंग से भरे गए हैं।
एकमात्र मढुवा गांव में ये इलाज होम्योपैथिक अस्पताल में हो रहा है। पर इसका भी अपना भवन नहीं है। इसके अलावा जिले के चार अन्य अस्पताल (चंपावत, लोहाघाट, पुलहिंडोला और बाराकोट) में होम्योपैथिक इलाज अपने नहीं, बल्कि एलोपैथिक अस्पतालों में संचालित हो रहे हैं।