शहर के एक प्राइवेट अस्पताल में निश्चेतक के बगैर ऑपरेशन कराने का मामला उजागर हुआ है। यह अस्पताल दूसरी जगह से निश्चेतक की व्यवस्था कर ऑपरेशन कराता था। उप जिलाधिकारी द्वारा शनिवार रात को की गई औचक छापामारी में ये खुलासा हुआ। उन्होंने अस्पताल में कई अन्य खामियों की भी बात कही है। छापामारी की रिपोर्ट तैयार कर डीएम को भेजी जाएगी। इस कार्रवाई के बाद अस्पताल में हड़कंप मच गया।
चंपावत में कुछ समय पहले खटकना पुल के पास जीवन अनमोल अस्पताल खुला। अस्पताल की शिकायत मिलने पर जिलाधिकारी डॉ.अहमद इकबाल ने चंपावत सदर की एसडीएम सीमा विश्वकर्मा को छापा मारने के आदेश दिए। एसडीएम ने बताया कि शनिवार रात को एक मरीज मनोहर लाल (52) के पौरुष ग्रंथि के ऑपरेशन की तैयारी चल रही थी। लेकिन मरीज को बेहोशी के लिए एनेस्थिसिया देने के लिए अस्पताल में निश्चेतक नहीं था। एसडीएम का कहना है कि पूछताछ करने पर अस्पताल में मौजूद स्टाफ काफी देर तक एनेस्थिसिया देने वाले डॉक्टर की जानकारी देने से कतराता रहा। जोर देने पर सरकारी अस्पताल में कार्यरत एक डॉक्टर का नाम बताया। मगर जब मुख्य चिकित्साधिकारी के जरिये डॉक्टर से मोबाइल पर बात की गई, तो उस डॉक्टर ने प्राइवेट अस्पताल में एनेस्थिसिया देने से साफ इंकार कर दिया।
एसडीएम ने बताया कि अस्पताल में डॉक्टर, पैरा मेडिकल स्टाफ, पंजीकरण और अन्य प्रक्रियाओं के पालन की विस्तृत जानकारी के लिए स्वास्थ्य विभाग से कहा जा रहा है। बताया गया कि अस्पताल में इस वक्त मात्र दो डॉक्टर हैं। कुछ डॉक्टरों को जरूरत पड़ने पर अन्य जगहों से बुलवाया जाता है। बाद में मरीज का ऑपरेशन नहीं हो सका। बताया गया कि शनिवार को कुल तीन ऑपरेशन होने थे। जिन्हें बाद में टाल दिया गया।
अस्पताल का संचालन नियमों के मुताबिक किया जा रहा है। कम खर्चे में बेहतर इलाज दिया जा रहा है। ऑपरेशन के लिए अस्पताल के पास फिलहाल निश्चेतक नहीं है। लेकिन ऑपरेशन से पूर्व दूसरी जगहों से निश्चेतक की व्यवस्था की जाती है।
दीपक जोशी, प्रबंधक, जीवन अनमोल अस्पताल।
जिले में हैं दो सरकारी निश्चेतक
चंपावत जिले के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है। जिले में डॉक्टरों के सृजित कुल 94 पदों के सापेक्ष इस वक्त 56 तैनात हैं। अस्थि रोग विशेषज्ञ, फिजीशियन सहित अधिकांश विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं है। लेकिन जिले में निश्चेतक दो हैं। एक जिला अस्पताल में और दूसरा टनकपुर संयुक्त अस्पताल में। इन सरकारी अस्पतालों में अब तक एक या दो बार ही एनेस्थिसिया देने की नौबत आई है। जिले के अधिकांश सरकारी अस्पताल मामूली मरीजों को रेफर करने के लिए चर्चित रहे हैं।