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विलुप्ति की कगार पर कल्पवृक्ष च्यूरा की प्रजाति

Tue, 10 Nov 2015 09:44 PM IST
सतीश जोशी ‘सत्तू’/अमर उजाला, चंपावत
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प्रकृति की अनमोल विरासत कहे जाने वाले च्यूरा (वानस्पतिक नाम व्यूरीरेशिया) पौधों की प्रजाति विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है। अतीत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार देने वाली च्यूरा प्रजाति की काफी उपयोगिता रही है। च्यूरा वृक्ष से वनस्पति घी एवं शहद का उत्पादन होने के साथ ही इसके पत्ते कंपोस्ट खाद के उत्पादन को बढ़ाने में भी काफी मददगार साबित होते हैं।
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वर्ष भर सदाबहार रहने वाले च्यूरा की पत्तियों से बनाई गई कंपोस्ट खाद में खरपतवार और कीटनाशक गुण पाए जाते हैं। यही कारण है कि च्यूरा वृक्ष को कल्पवृक्ष माना जाता है। आयुर्वेदाचार्य डा.एनडी जोशी के अनुसार इसका फल विटामिनयुक्त होता है, जिसका अर्क निकालकर शीतल पेय के रूप में प्रयोग में लाया जाता था। अतीत में खाद्य तेलों के अलावा चॉकलेट बनाने में भी इसका प्रयोग किया जाता था। च्यूरा प्रजाति का तना इमारती लकड़ी और काष्ठ उद्योग में काम आता है। इसकी जड़ें गहरी होने के कारण भूमि कटाव को रोकने में भी काफी सहायक होती हैं।

नहीं हो रहा प्रजाति के संरक्षण का प्रयास
च्यूरा प्रजाति के संरक्षण की दिशा में अपेक्षित शोध कार्य नहीं किए जा रहे हैं। पर्यावरणविद कैलाश तलनियां का कहना है कि वन विभाग सहित अन्य संबंधित विभागों की ओर से जहां विभिन्न प्रकार की प्रजाति के पौधों का रोपण किया जाता है, वहीं बहुमूल्य औषधीय गुणों के साथ ही सर्वगुण संपन्न च्यूरा प्रजाति के पेड़ों की उपेक्षा जारी है, जिस कारण अब च्यूरा प्रजाति के पेड़ों की संख्या दिनों-दिन सिमटती जा रही है और नए पौधों का रोपण नहीं हो रहा है।
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गठिया रोग और एलर्जी का रामबाण इलाज
जिले में लधिया घाटी सहित कई हिस्सों की आबोहवा च्यूरा प्रजाति के लिए अनुकूल हैं, मगर इसके संवर्द्धन को फिलहाल कोई सरकारी योजना नहीं है। जड़ी-बूटी विशेषज्ञ वैद्य लीलाधर जोशी का कहना है कि च्यूरा में पर्याप्त औषधीय गुण हैं। गठिया के रोगों में इसकी तेल मालिश से बहुत फायदा होता है। इसके अलावा कई तरह की एलर्जी में भी यह अचूक दवा की तरह काम आता है।
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