18 साल से चंपावत जिला मुख्यालय में वन निगम का टाल भूमि के लिए तरस रहा था। आखिरकार अब टाल को जमीन मिल गई है और निगम का यह टाल किराए की जमीन पर निर्भर नहीं रहेगा। इससे न केवल किराया बचेगा बल्कि लकड़ी का पर्याप्त भंडारण भी हो सकेगा। इन दिनोें इस स्थान पर समतलीकरण का काम चल रहा है।
चंपावत में 1988 में टाल खुला था। टाल से शवदाह और अन्य उपयोग के लिए जलौनी लकड़ी होती है। किराए पर चलने वाला यह टाल किराए संबंधी विवाद के चलते बंद होने की दहलीज पर आ गया था। वन निगम के मुताबिक टाल का किराया पुरानी दर से 300 रुपए प्रति माह था, जबकि जमीन स्वामी इसे बढ़ाकर 2000 करने की मांग करते रहे, लेकिन निगम ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। किराया नहीं बढ़ने पर टाल खाली करने का अल्टीमेटम भी दिया गया। भू स्वामी ने 2007 से किराए की रकम भी नहीं ली है।
अलबत्ता अब प्रशासन ने जिला अस्पताल के नजदीक टाल के लिए दो नाली जमीन उपलब्ध करा दी। जिस पर इन दिनों समतलीकरण का काम चल रहा है। टाल प्रभारी हरीश पंत का कहना है कि टाल में स्थायी ढांचे के लिए निगम मुख्यालय से धन की मांग की गई है।
पिथौरागढ़ है चंपावत का डीएलएम दफ्तर
चंपावत। चंपावत वन प्रभाग के तहत 1.2 लाख हेक्टेयर से अधिक जंगल है। हर साल वन विभाग हजारों पेड़ों का छपान करता है, जिसका कटान वन निगम को करना होता है, लेकिन इस कार्य के लिए जिले के पहाड़ी हिस्से में डिवीजनल लौगिंग प्रबंधक (डीएलएम) का कार्यालय नहीं है। यहां के काम का संचालन पिथौरागढ़ से होता है। वन निगम कर्मचारी संघ के अध्यक्ष महेश जोशी का कहना है कि दूसरे डिवीजन से संचालन की वजह से कटान के काम में देरी और कर्मियों को दिक्कत होती है। चंपावत में डीएलएम कार्यालय खोलने की मांग करते हुए कई बार मुख्यमंत्री और वन मंत्री को ज्ञापन भी भेजा जा चुका है।