बरसात के मौसम में मां श्री पूर्णागिरि धाम की यात्रा सुरक्षित नहीं है। दरकती पहाड़ियों और जगह-जगह क्षतिग्रस्त पैदल मार्ग से जान की सुरक्षा का खतरा बना हुआ है। पूर्व में हो चुके हादसों के बाद भी प्रशासन यात्रियों की सुरक्षा को लेकर कतई संजिदा नहीं है। बरसात के मौसम में कब और कहां आपदा आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है और फिर पर्वतीय क्षेत्र में तो आपदा का खतरा हमेशा बना रहता है।
पहाड़ी में स्थित होने से बरसात में मां पूर्णागिरि धाम की यात्रा में भी खतरा है। भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक कुमाऊं की ज्यादातर पहाड़ी कमजोर हैं और पूर्णागिरि की पहाड़ियां भी कच्ची हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा अधिक बना रहता है। पूर्णागिरि की पहाड़ियां बरसात में हर साल दरकती हैं। वर्ष 2009 और 2010 में जबरदस्त भूस्खलन हो चुका है। 2009 में काली मंदिर की पहाड़ी में भूस्खलन से न सिर्फ प्राचीन काली मंदिर और आसपास की दुकानें ध्वस्त हुई थीं, बल्कि दुकान में सोये एक युवक का भी पता नहीं चला। वहीं 2010 में मुख्य मंदिर में हुए भूस्खलन में सिद्धनाथ और चौरासी मंदिर भूस्खलन की भेंट चढ़ चुके हैं। जोखिम भरा सफर बाटनागाड़ से ही शुरू हो जाता है। भैरव मंदिर से आगे तीन किलोमीटर का सफर पैदल तय करना होता है और मानसून काल में इस मार्ग पर चलना जोखिम भरा सफर बना रहता है।