जमुवागोठ थपलियालखेड़ा (चंपावत)। सीमा के अवैतनिक प्रहरी हमारे ग्रामीण हैं जो नेपाल सीमा पर बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। गांव में बिजली है नहीं और महंगे डीजल की वजह से गांव की एकमात्र चक्की भी बंद हो गई है। मजबूरन ग्रामीणों को गेहूं पिसवाने के लिए पड़ोसी देश नेपाल के ब्रह्मदेव जाना पड़ रहा है। सीमा पर बसे इस गांव के लोग हर कदम पर मुश्किलें झेलते हैं। 21 साल से नाले पर पुलिया नहीं बनी है। पेयजल के लिए भी ग्रामीणों ने खुद ही हैंडपंप लगाया है।
तीन ओर से नेपाल सीमा से लगे इस भारतीय भूभाग जमुवागोठ थपलियालखेड़ा के निवासियों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रहीं हैं। सैलानीगोठ ग्राम पंचायत की इस वन भूमि में रहने वाले 45 परिवारों के 249 लोगों को गेहूं पिसवाने के लिए पड़ोसी देश नेपाल जाना होता है। गनीमत यह है कि नेपाल के साथ भारत का सांस्कृतिक मेलजोल है और रोटी-बेटी का रिश्ता है। अन्यथा यहां के लोगों के लिए जीवन और दुश्वार हो जाता। सीमा को विभाजित करने वाले पिलर के अलावा नेपाल की ओर से बनी सड़क भले ही दोनों देशों को बांटती है, लेकिन ब्रह्मदेव से लगे इस गांव के अपने पड़ोसी देश से रिश्ते खासे गर्म हैं। नेपाल आर्थिक रूप से कमजोर देश जरूर है, लेकिन वहां की सड़कें और जगमगाते गांव देखकर सीमा के इस पार के लोगों की हसरत भी वैसी ही सुविधाएं चाहती हैं।
गांव के नौजवान शंकर सिंह कहते हैं कि हम एक नाले पर पुलिया के लिए 21 साल से इंतजार कर रहे हैं, जबकि ब्रह्मदेव में चमचमाती सड़कें हैं, हमेशा बिजली रहती है। हमारे यहां पांचवीं से आगे की पढ़ाई के लिए गांव के छोटे बच्चे 19 किमी दूर जाते हैं। दवाई के लिए भी साढ़े नौ किमी दूर टनकपुर जाने की बेबसी है। सरकारी सस्ते गल्ले के लिए भी सैलानीगोठ जाना पड़ता है। प्यास बुझाने के लिए भी खुद ही हैंडपंप लगाए हैं। उत्तराखंड अलग राज्य बनने के बाद एक प्राइमरी स्कूल, सौर ऊर्जा वाली बिजली और इसी पर आधारित नलकूप हमारी समग्र पूंजी है। कोरोना के कारण स्कूल बंद हैं। वहां 17 छात्र-छात्राएं और दो शिक्षक हैं।
वन भूमि होने की वजह से गांव में विकास प्रभावित हो रहा है। काबिज जमीन पर वैधानिक स्वामित्व न होने कारण ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का लाभ कम मिल पा रहा है।
हिमांशु कफल्टिया, एसडीएम
वोट की दरकार पर सुविधाएं मांगने पर कहते हैं अगली बार
जमुवागोठ थपलियालखेड़ा (चंपावत)। एक बार फिर विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित हो गई है और अलग-अलग पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगने भी सीमांत गांव में पहुंचने लगे हैं। गांव में जब लोग पिछले साल किए हुए वादों की याद दिलाते हैं तो जवाब मिलता है अगली बार गांव तक सड़क पहुंचेगी और बिजली भी। इसे विडंबना नहीं तो क्या कहा जाए कि राज्य गठन के बाद हुए चुनावों में जीत दर्ज करने के बाद कोई जनप्रतिनिधि यहां नहीं आया।
टनकपुर से नौ किलोमीटर दूर शारदा नदी से लगा सीमा का ये ऐसा गांव है, जहां न तो कभी किसी सांसद ने दस्तक दी और ना ही किसी मंत्री ने। वैसे भी ऊबड़-खाबड़ रेतीले रास्ते के बीच टनकपुर बैराज होकर गांव तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। 51 महिलाओं सहित यहां के कुल 119 मतदाता 14 फरवरी को प्राइमरी स्कूल के मतदान केंद्र में सियासत का भविष्य तय करेंगे लेकिन एक महीने पहले तक कार्यकर्ता तो आए हैं लेकिन किसी नेता ने यहां दस्तक नहीं दी है। नेपाल सीमा से लगे इस गांव के लोग उत्तराखंड में ही विभिन्न चुनावों में 12 बार मतदान कर चुके हैं। फिर भी उनकी और उनके गांव की तस्वीर नहीं बदली। चार बार विधानसभा (2002, 2007, 2012 और 2017), चार बार लोकसभा (2004, 2009, 2014 और 2019) और सैलानीगोठ ग्राम पंचायत के लिए चार बार पंचायती चुनाव (2003, 2008, 2014 और 2019) में वोट दे चुके हैं। चुनाव दर चुनाव छले जा गांव वालों की मांग बस इतनी सी है कि सड़क, बिजली और पानी की सुविधा मयस्सर हो जाए तो गांव की युवा पीढ़ी भी नई दुनिया से कदम से कदम मिलाकर चल सके।
वोट की खातिर झूठी कसम से भी गुरेज नहीं : मुखिया
गांव के मुखिया 73 वर्षीय मोहन सिंह कहते हैं कि हमें जो चाहिए वो नहीं मिला लेकिन नेता विकास के वादे कर वोट झटक लेते हैं। मुखिया जी कहते हैं कि यहां आने वाले नेता वोटों की खातिर झूठ बोलने में रत्तीभर गुरेज नहीं करते हैं। एक नेताजी ने यहां के मंदिर में कसम खाई। कह दिया कि जीतने के दो दिन के भीतर बिजली पहुंचा देंगे और फिर कसम की याद दिलाने पर टालमटोली करते हैं।
खेती और मजदूरी का ही सहारा
थपलियालखेड़ा गांव का एक भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं है। छिटपुट खेती और मजदूरी के अलावा रोजगार का कोई जरिया नहीं है। ग्रामीण बताते हैं कि पहले दूध बेचते थे, लेकिन अब चारागाह की जमीन की कमी से गाय-भैंस पालना मुश्किल हो रहा है। खेती लायक 21 एकड़ जमीन के लिए सिंचाई का बंदोबस्त भी नाकाफी हैं। एक साल पहले लगा सोलर नलकूप भी बस धूप आने पर ही काम करता है। इससे भी बड़ी परेशानी जंगली जानवरों की चुनौती है।
बस इतना भर काम हुआ
राजकीय प्राइमरी स्कूल, सौर ऊर्जा से रात का उजाला और सौर ऊर्जा पर आधारित नलकूप।
ये है गांवों की मुख्य दिक्कतें
सरकारी राशन की दुकान गांव में हो, सड़क, आठ मीटर चौड़ाई वाली नहर को पार करने के लिए पुलिया की जरूरत, पानी, बिजली, एएनएम केंद्र, हाईस्कूल की मंजूरी। ग्रामीण आवास योजना, शौचालय की सुविधा मिले।
क्या बोले मतदाता
गांव में अमीर आदमी कोई हुआ नहीं, इसलिए कोई सुनवाई नहीं है। सरकार से कोई फायदा नहीं मिला। चुनाव में कहते हैं कर देंगे, बाद में बात भी नहीं करते।
- हरिप्रसाद जोशी।
हम वोट गांव में देते हैं लेकिन सुविधाएं गांव तक नहीं पहुंची 10 साल पहले तक सैलानीगोठ में मतदान केंद्र था। अब गांव के प्राइमरी स्कूल में वोट देते हैं।
- प्रीतम सिंह।
चुनाव में कई नेता आश्वासन देते हैं, लेकिन पूरा नहीं करते। गांव वालों की जरूरत को पूरा करने के लिए कोई नहीं आता, लेकिन मांगने के लिए हर कोई आता है।
- दशरथ सिंह।
वोट देते-देते थक गए हैं, लेकिन मिला कुछ नहीं। अब वोट देने का भी मन नहीं है। हमारे लिए विकास का मतलब झूठे आश्वासन हो गया है। नोटा भी विकल्प है।
- प्रकाश सिंह।
प्राइमरी स्कूल में बरसात में कीचड़ भर जाता है। छोटे बच्चों को हम पढ़ने की भी सहूलियत नहीं दे पा रहे हैं। सड़क, पानी-बिजली तक नहीं मिल सकी है।
- कुंती देवी।
हम 2002 से वोट दे रहे हैं, लेकिन गांव में कुछ नहीं बदला। सोलर बिजली के अलावा कुछ नहीं है। बरसात और कोहरे में धूप न आने पर अंधेरा छाया रहता है।
- देवकी देवी।
यहां एक पुलिया तक नहीं बन पा रही है। बरसात में बच्चे टनकपुर स्कूल तक नहीं जा पाते। नेपाल होकर जाने में बनबसा की दूरी ढाई गुना तक बढ़ जाती है।
- सूरज सिंह, ग्रामीण।
वन भूमि में होने से थपलियालखेड़ा गांव के विकास के कई काम तक प्रभावित हो रहे हैं। गांव की सबसे मुख्य जरूरत बिजली और सड़क की है।
- रमिला आर्या, ग्राम प्रधान, सैलानीगोठ।
थपलियालखेड़ा गांव के खेत-खलिहान। संवाद न्यूज एजेंसी- फोटो : TANAKPUR