संवेदनशील श्यामलाताल को कोई राहत नहीं
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चंपावत जिले के पर्यटन स्थल श्यामलाताल में डेढ़ दशक से पहाड़ में लगातार भूस्खलन हो रहा है, इससे कई गांव खतरे की जद में हैं और कई परिवार अन्यत्र जा चुके हैं, लेकिन सरकार न तो खतरे की जद में आए गांवों के परिवारों के विस्थापन की व्यवस्था कर रही है और न ही दरकती पहाड़ी को बचाने की कोशिश।
जिले का पर्यटन स्थल श्यामलाताल आसपास की बिसोरिया नाले से लगी पहाड़ियों में सालों से हो रहे भूस्खलन से खतरे की जद में आ गया है। लंबे अर्से से दरक रही पहाड़ियों की और न तो शासन का ध्यान है और न ही प्रशासन गंभीर है। ऐसे में दरकते पहाड़ों से सहमे लोग अन्यत्र जाने को विवश हैं। हालिया बारिश से पहाड़ी इलाकों के लोगों में खौफ पैदा हो गया है।
भू-विज्ञान के लिहाज से कुमाऊं की पहाड़ियां कमजोर हैं और मामूली बारिश में भी पहाड़ी में भूस्खलन का खतरा आम बात है। चंपावत जिले में सूखीढांग क्षेत्र की श्यामलाताल की पहाड़ी वर्षों से दरक रही हैं, जिससे कई गांवों में भूमि धंस रही है और कई मकानों में दरार तक आ चुकी है। यहां तक कि पर्यटन स्थल श्यामलाताल तक भूस्खलन का असर दिखाई देने लगा है।
पूर्णागिरि मार्ग पर बाटनागाड़ में आ रहा मलबा भी इसी दरकती पहाड़ी की देन है, मगर इसके ट्रीटमेंट की न तो शासन को चिंता है और ही प्रशासन को। भू-विज्ञानी यहां की पहाड़ियों पर भूस्खलन के खतरे से पहले ही आगाह करा चुके हैं, मगर ट्रीटमेंट के नाम पर अब तक सर्वे के सिवाय कुछ नहीं हुआ है।ग्राम प्रधान भगीरथी तिवारी का कहना है कि दरकती पहाड़ी से कोई अनहोनी हुई तो इसके कोई शक नहीं की यह शासन-प्रशासन की अनदेखी का ही नतीजा होगी।
भू-गर्भीय सर्वे की संस्तुति की गई है : एसडीएम
पूर्णागिरि (टनकपुर) तहसील के एसडीएम नरेश दुर्गापाल ने बताया कि श्यामलाताल के बिसोरिया नाले से लगी पहाड़ियों में हो रहे भूस्खलन से आसपास के गांवों में खतरे का भू-गर्भीय सर्वे कराने के लिए जिलाधिकारी से सिफारिश की गई है। सर्वे में यदि खतरे की बात सामने आई तो इससे प्रभावित होने वाले परिवारों को अन्यत्र विस्थापित करने की कार्रवाई की जाएगी।