भारत-नेपाल सीमा में महाकाली के तट पर 24 नवंबर को लगने वाले क्षेत्र के प्रसिद्ध नगरूघाट मेले की तैयारियां शुरू हो गई हैं। प्रतिवर्ष वैकुंठ चतुर्दशी के दिन लगने वाले इस मेले को लेकर लोगों में खासा उत्साह होता है। इस मेले की विशेषता यह है कि यह रात में लगता है।
बगोटी, सल्टा, जमरसों से देव रथ एवं पासम, डुंगरालेटी, सुनकुरी, सुल्ला, मजपीपल, देवकूड़ा आदि गांवों से रात को मशालों और लैंपों के सहारे देवडांगरों को कंधों में बैठाकर मंदिर तक ले जाया जाता है। बगोटी, सल्टा, जमरसों से नागार्जुन देवता के भंवर रूप अवतरित होकर भक्तों के कंधों में सवार होकर नगरूघाट धाम पहुंचते हैं। यहां देवरथों और शोभायात्राओं से प्राचीन मंदिर की परिक्रमा की जाती है।
नागार्जुन देवता को महाकाली का भंवर माना जाता है। इनका निवास महाकाली के विशाल जलाशय के अंदर स्थित मंदिर में माना जाता है। महाभारत कालीन इस देवता के अंश भारत और नेपाल क्षेत्र के तमाम गांवों में विस्थापित हैं। वैकुंठ चतुर्दशी के अवसर पर लगने वाले इस मेले में भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में भारत तथा नेपाल के लोग आते हैं। यहां के गांवों में हरिबोधिनी एकादशी के दिन से देव गद्दी लगने के साथ ठुस्कों, झोड़ों, चांचड़ी का गायन शुरू हो जाता है। मेले में विभिन्न सांस्कृतिक दलों की ओर से रंगारंग कार्यक्रम भी किए जाते हैं। मेले की तैयारियों को लेकर बहादुर चंद, ऊषा नलवा, डा.सतीश पांडेय, कमल बोहरा, पुष्कर बोहरा आदि तमाम लोग जुटे हुए हैं।