उत्तर भारत के सुविख्यात मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ में यातायात की सुविधा का विस्तार होने के बाद अब साल भर तीर्थयात्रियों की आवाजाही बनी रहती है। मेला अवधि में तो यात्रियों को पथ प्रकाश, सुरक्षा, चिकित्सा, सफाई आदि सुविधाएं सरकारी तौर पर मुहैया कराई जाती है, लेकिन गैर मेला अवधि में व्यवस्थाओं का भार मंदिर समिति के जिम्मे रहता है। स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं स्थायी नहीं होने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। चैत्र नवरात्रों के लिए यहां होली के तुरंत बाद हर साल तीन माह का सरकारी मेला लगता है। राज्य के कुमाऊं मंडल में यह इकलौता शक्तिपीठ है, जहां इतनी लंबी अवधि का मेला लगता है। डेढ़ दशक पहले तक सड़क नहीं होने से यात्रियों को ठुलीगाड़ से आगे 11 किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी, लेकिन सड़क बनने के बाद पैदल यात्रा तीन किमी की रह गई है। शक्तिपीठ में चिकित्सा, पथ प्रकाश, सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था नहीं होने से मंदिर समिति अपने स्तर से यात्रियों को सुविधाएं मुहैया कराती है।
यहां तक कि शारदीय नवरात्रों में भी पथ प्रकाश और चिकित्सा जैसी जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था भी सरकारी तौर पर नहीं की जाती है। मंदिर समिति अध्यक्ष किशन तिवारी ने बताया कि समिति कोष में जमा धन से गैर मेला अवधि में व्यवस्थाएं की जाती है। इस बार भी चैत्र नवरात्रों के लिए समिति ने एक-एक दर्जन स्वयंसेवक और स्वच्छक तैनात किए हैं। शक्तिपीठ के पुजारी भुवन चंद्र पांडेय ने बताया कि पिछले कुछ सालों से श्रद्धालुओं की वर्षभर आवाजाही काफी बढ़ गई है, लेकिन जरूरी सुविधाओं की स्थायी व्यवस्था न होने से यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ती है। उनका कहना है कि स्थायी व्यवस्थाएं मुहैया होने पर श्रद्धालुओं की आवाजाही का ग्राफ और बढ़ेगा।