जंक खा रही स्वास्थ्य विभाग के सचल चिकित्सा वाहन।
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जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था ही बीमार है। कुत्ते के काटने पर लगाए जाने वाला रेबीज का इंजेक्शन तक जिला अस्पताल में उपलब्ध नहीं है, लेकिन दारू की दुकान खुलवाने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाया जा रहा है। जिले में औसतन रोज आठ हजार से अधिक शराब की बोतलें पी जाती है। जिले के अस्पतालों में लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा है।
वहीं सचल चिकित्सा वाहन का भी लंबे समय से उपयोग नहीं हो पा रहा है। लोग मामूली इलाज के लिए दूसरे अस्पतालों में दौड़ लगाने को मजबूर है। शराब से जिले में करीब 36 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व आ रहा है। जिले में शराब की 16 दुकानें हैं। कैंटीन की शराब को मिलाकर रोजाना औसतन आठ हजार से अधिक शराब की बोतलें पी जाती है।
शराब की बहुतायत खपत वाले इस जिले में स्वास्थ्य की हालत उतनी ही खराब है। जिले में कुल डॉक्टरों के स्वीकृत 95 पदों में से कुल 27 स्थायी डॉक्टर की ही तैनाती है। यहां तक कि तीन सचल चिकित्सा वाहन भी इलाज से दूर हैं। सात साल से चल रही आरोग्य रथ और जैन वीडियो ऑन व्हीकल वाहन सेवा बीते करीब एक साल से ठंडे बस्ते में है।
सड़क से लगे ग्रामीण इलाकों में इनके जरिए कैंप लगाकर एक्सरे, अल्ट्रासाउंड और खून की जांच की सुविधाओं के अलावा मरीजों को निशुल्क दवा दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन 2016 से ये सेवाएं भी ठप पड़ी हुई हैं।
इसी तरह 2006 में 31.50 लाख रुपये की लागत से खरीदी गए चलित शल्य चिकित्सालय एवं परीक्षण वाहन (मोबाइल वैन) भी छह वर्ष से जंग खा रहे हैं।
एक वर्ष में 72 कैंप लगाने के लक्ष्य के विपरीत इस वैन से अब तक महज 39 ही कैंप लगाए गए। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. डीएल शाह का कहना है कि बजट नहीं मिलने से ये सेवाएं फिलहाल ठप हैं। इन्हें संचालित करने का प्रयास किया जा रहा है।