चंपावत। वे भले ही पर्यावरणविद न हो, मगर पर्यावरण के प्रति उनमें अपार संवेदनाएं हैं। पेड़-पौधों को जीवन देना, पेड़-पौधों के परिवार को बढ़ाना उनका जुनून रहा है। अपनी इसी प्रवृत्ति के चलते उन्होंने अपने गांव पवेत के इलाके के सूखेपन को हरियाली से भर दिया। नए पेड़ लगाए, पुराने पेड़ों को कटने से रोका। उनके इस प्रयास से यहां पेयजल की कमी भी दूर हुई।
चंपावत से करीब पांच किलोमीटर दूर पवेत गांव अन्य कई इलाकों से अलग है। ये फर्क विकास का नहीं पर्यावरण के नजरिए का है। वन पंचायत के सरपंच रहे श्याम नारायण पांडेय ने पवेत वन पंचायत की शक्ल बदल डाली। उजाड़ इलाके को हराभरा किया।
गांव के बुजुर्ग त्रिलोक सिंह की प्रेरणा से उन्होंने इसके लिए लोगों को प्रेरित किया, तो वहीं कुछ लोगों का विरोध भी सहा। 1998 से 2001 तक उन्होंने खूब पेड़ लगाए और पेड़ों को कटने से बचाया भी। 84 हेक्टेयर जंगल में नाशपाति के 300 पेड़ों के अलावा बांज के 100 से ज्यादा पेड़ अब यहां की हरियाली को बढ़ा रहे हैं।
जंगल की घेराबंदी कर उसे महफूज बनाया। जंगल की पत्तियों का उपयोग नहीं कर दूसरों को भी पेड़ों की पत्तियों को न तोड़ने के लिए प्रेरित किया। पशुओं के चारे के लिए लोगों को भूसे के इस्तेमाल के लिए भी प्रोत्साहित किया। इतना ही नहीं उनकी पहल का असर आसपास के गांवों तक भी हुआ। वहां के लोगों ने भी जंगल बचाने की मुहिम में साथ दिया।
चंपावत। वन संरक्षण और संवर्द्धन के चलते 2002 में श्याम नारायण पांडेय उत्तराखंड स्तर के पुरस्कार से पुरस्कृत किए जा चुके हैं। तत्कालीन वन मंत्री नवप्रभात ने उन्हें ट्राफी और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया।