चंदन के लिए मशहूर कर्नाटक की तरह ही चंपावत में भी चंदन की खेती होगी। उत्तराखंड भेषज विकास इकाई देहरादून व पौड़ी गढ़वाल के अलावा चंपावत में इसके कृषिकरण के लिए कार्ययोजना तैयार करा रही है। इस जिले में यह खेती कलस्टर के रूप में 300 नाली क्षेत्र में होगी। इसके कामयाब होने से चंपावत को न केवल चंदन की खेती के लिए जाना जाएगा, बल्कि यहां के जड़ी-बूटी काश्तकारों की आमदनी में भी तेजी से इजाफा होगा।
उत्तराखंड भेषज विकास इकाई के मुख्य अधिशासी अधिकारी (सीईओ) डॉ. एमएस बिष्ट ने 18 नवंबर को देहरादून में हुई बैठक में इस संबंध में विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। चंपावत में चंदन के अलावा तेजपात की भी 300 नाली में खेती की योजना है, लेकिन यहां तेजपात का पहले से ही व्यापक तौर पर (1354 नाली में) कृषिकरण किया गया है। जबकि चंदन की खेती पहली बार की जाएगी। इसके अतिरिक्त बागेश्वर जिले में प्राकृतिक तौर पर सफेद चंदन के कृषिकरण की खेती की कवायद की जाएगी। चंदन की खेती की कलस्टर के रूप में विकसित किया जाएगा। कार्ययोजना में प्लांटिंग सामग्री, उत्पादन की ग्रेडिंग, पैकिंग, विपणन, लेवलिंग के ब्यौरे के अलावा इस खेती से काश्तकारों की आमदनी में होने वाली बढ़ोत्तरी और मिलने वाले रोजगार का भी विवरण देना होगा। जनवरी 2018 तक इस खेती की कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाएगा।
घाटी वाले तीन इलाकों में होगी खेती
विविधता भरी जलवायु वाले चंपावत जिले में चंदन की खेती घाटी वाले इलाकों में होगी। भेषज विकास इकाई के चंपावत जिले के समन्वयक राकेश वर्मा ने महज एक सप्ताह में ही इसकी खेती लायक जगह तलाशने के लिए मौका मुआयना किया। काश्तकारों से मंत्रणा करने के बाद उन्होंने जिले में मां पूर्णागिरि धाम को जाने वाले मार्ग, चल्थी और लधिया घाटी को चंदन की खेती के लिए उपयुक्त पाया है। तीनों स्थानों में 100-100 नाली के कलस्टर बना खेती का प्रस्ताव है। जल्द ही इस प्रस्ताव को मुख्यालय भेजा जाएगा। एक नाली में करीब 12 पेड़ लगाए जा सकेंगे। इस तरह 300 नाली में 3600 पेड़ लगाए जाएंगे। जड़ीबूटी काश्तकार को नियमित रूप से प्रति वर्ष 12 पेड़ों से ही 96 हजार रुपये की आय हो सकेगी।
बहुउपयोगी है चंदन के पेड़
चंदन के पेड़ को लगाने के बाद सात साल में इसकी लकड़ी उपयोग लायक बनती है। चंदन का उपयोग मुख्य रूप से हवन सामग्री और सौंदर्य प्रसाधन के तेल के रूप में किया जाता है। साथ ही त्वचा रोग और गठिया रोग से निजात दिलाने में भी मददगार हैं।
जिले में 3900 नाली में हो रही जड़ीबूटी की खेती
जिले में इस वक्त करीब 1900 से अधिक काश्तकार 3900 नाली जमीन में जड़ीबूटी की खेती कर रहे हैं। तेजपात, रीठा, सतवार, आंवला, समेवा, सर्पगंधा, घुड़बच, तुलसी, किड़मोला, कड़ी पत्ता, कपूर कचरी का कृषिकरण किया गया है। जड़ीबूटी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2016-17 में ही 2664 क्विंटल जड़ीबूटियों की बिक्री से काश्तकारों को 1.12 करोड़ रुपये की कमाई हुई।
कुमाऊं के जिलों में जड़ीबूटी की विभिन्न प्रजातियों की प्रस्तावित खेती
जिले चयनित प्रजाति
पिथौरागढ़ कूठ, तेजपात।
अल्मोड़ा तेजपात।
बागेश्वर तेजपात व प्रायोगिक तौर पर सफेद चंदन।
चंपावत चंदन व तेजपात।
नैनीताल तेजपात।
ऊधमसिंह नगर सतावर व सर्पगंधा।