सरकार बदले 100 से अधिक दिन हो गए, मगर न स्वास्थ्य सेवाओं की सूरत बदली और न ही मरीजों के लिए अच्छे इलाज की उम्मीद जगी। भिंगराड़ा के अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (एपीएचसी) में डॉक्टर की तैनाती के बावजूद अस्पताल के ताले नहीं खुल सके हैं। 2017 में अब तक एक भी दिन इस अस्पताल से लोगों को उपचार नहीं मिल सका है। नतीजा यह हो रहा है कि इस क्षेत्र के चार हजार से अधिक ग्रामीण छोटी सी छोटी बीमारी के उपचार के लिए भी 47 किलोमीटर दूर लोहाघाट की दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
स्वास्थ्य सुविधा की कमी और ग्रामीणों द्वारा उठाई जा रही मांग केमद्देनजर अप्रैल 2016 में नेपाल सीमा से लगे तामली के साथ भिंगराड़ा में भी अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुला। एएनएम केंद्र के भवन पर ही अस्पताल को संचालित किया गया। शुरुआत में डॉ. कुलदीप सिंह खड़ायत ने यहां सेवा दी। लेकिन उनके जाने के बाद अस्पताल बंद हो गया।
पिछले साल दिसंबर माह से न यहां डॉक्टर थे और न ही फार्मेसिस्ट। अस्पताल में ताला लटका हुआ है। इस साल एक मई को इस अस्पताल में अनुबंध के डॉक्टर की तैनाती के आदेश हुए। लेकिन न डॉक्टर अस्पताल तक पहुंचे और नहीं अस्पताल के ताले खुल सके। पैरा लीगल वालंटियर उमेश चंद्र भट्ट, रमेश भट्ट सहित यहां के तमाम ग्रामीणों का कहना है कि डॉक्टर को यहां भेजे जाने के बावजूद भिंगराड़ा का अस्पताल संचालित नहीं हो पाना न केवल मरीजों के साथ धोखा है, बल्कि गंभीर धांधली है।
भिंगराड़ा अस्पताल पर भिंगराड़ा, मड्योली, चल्थिया, गड्यूरा, बैजगांव, खरहीं, बिरगुल, टाक खंदक सहित 18 से अधिक गांव आश्रित हैं। लेकिन अस्पताल बंद होने से यहां के लोगों को मामूली इलाज के लिए भी 47 किमी दूर लोहाघाट जाने को मजबूर होना पड़ रहा है। इसके चलते ग्रामीणों को न केवल बेवजह परेशानी झेलनी पड़ रही है, बल्कि आवाजाही के किराए के रूप में भी 200 रुपये खर्च करना पड़ रहा है।
कोट......
इस साल पहली मई को भिंगराड़ा के एपीएचसी के लिए बांड वाले डॉक्टर डॉ. इस्सार खान को भेजे जाने के आदेश किए गए थे। अस्पताल में डॉक्टर नहीं होने की विभाग को जानकारी नहीं है। अगर अस्पताल में डॉक्टर नहीं जा रहे हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यह भी पता लगाया जाएगा कि अस्पताल जाए बगैर डॉक्टर को वेतन तो नहीं दिया जा रहा है।
डॉ.एमएस बोहरा
मुख्य चिकित्साधिकारी, चंपावत।
टांण अस्पताल में तो डॉक्टर की ही तैनाती नहीं हुई
रीठा साहिब (चंपावत)। लधिया घाटी के दूरस्थ टांण क्षेत्र सहित एक दर्जन से अधिक गांवों के लोग अस्पताल होते हुए इलाज को तरस रहे हैं। इस राजकीय एलोपैथिक अस्पताल में तो अब डॉक्टर ही तैनात नहीं है। डॉक्टर नहीं होने से ग्रामीणों को इलाज को 24 किलोमीटर दूर रीठा साहिब आने को मजबूर होना पड़ रहा है।
लधिया घाटी से लगे गांव टांण के एसएडी का लाखों रुपये से बना भवन धन की बर्बादी के अलावा किसी काम का नहीं है। टांण, साल, ककनई, खटोली, वैला, मछियाड़ सहित 10 से ज्यादा गांव इस अस्पताल पर आश्रित हैं। जनवरी 2016 के बाद यहां आयुर्वेदिक डॉक्टर के सहारे इलाज हो रहा था। मगर दिसंबर माह में आयुर्वेदिक डॉक्टर का दूसरे जिले में तबादले होने के बाद से अस्पताल डॉक्टर विहीन हो गया है। डॉक्टर ही नहीं, अस्पताल में फार्मेसिस्ट की भी तैनाती नहीं की गई है। एक वार्ड ब्वाय राजेंद्र गिरि गोस्वामी अस्पताल का ताला जरूर खोलते हैं।
ग्राम प्रधान भागीरथी गड़कोटी, उप प्रधान आनंदी देवी, भोला दत्त गड़कोटी, रामदत्त जोशी, गंगा जोशी, खीमानंद गड़कोटी आदि का कहना है कि यह अस्पताल मरीजों के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय उनके घावों को हरा कर रहा है। मरीजों को मामूली परेशानी के लिए रीठा साहिब के अस्पताल तक दौड़ना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि नई सरकार बनने से उम्मीद थी, मगर हालात में अब तक कोई बदलाव नहीं हो सका है। अस्पताल में डॉक्टर की जल्द तैनाती नहीं होने पर उन्हें आंदोलन की राह पकड़ने को मजबूर होना पड़ेगा। इधर स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि डॉक्टर की तैनाती के लिए उच्चाधिकारियों से आग्रह किया गया है।