दर्जनों गांव और 10 हजार से अधिक की आबादी वाला तल्लादेश क्षेत्र नेपाल सीमा से भी लगा है। बुनियादी पिछड़ेपन का दर्द झेल रहे इस गांव की पीड़ा को यहां की खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवा और अधिक बढ़ाती है। तल्लादेश क्षेत्र की धुरी मंच गांव में इलाज के लिए एलोपैथिक अस्पताल है, लेकिन यह अस्पताल दवा कम, दर्द ज्यादा देता है। फिलहाल रेगड़ू आयुर्वेदिक अस्पताल के एक डॉक्टर को मरीजों की सेहत का जिम्मा दिया गया है। इलाज का बंदोबस्त नहीं होने से यहां मरीज कम पहुंचते हैं और तल्लादेश के लोग भी इस अस्पताल से आगे बढ़कर सीधे जिला अस्पताल आ जाते हैं।
मुख्यालय से करीब 32 किमी दूर मंच का अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की इमारत चकाचक है। लाखों रुपयों के इस भवन का पिछले साल ही उद्घाटन हुआ है, लेकिन इलाज के लिए यहां व्यवस्था नाकाफी है। शुक्रवार को डॉक्टर अस्पताल में मौजूद नहीं थे। फार्मेसिस्ट जगदीश राणा ही इलाज के लिए अस्पताल में इकलौती आस है। उनका कहना है कि अस्पताल प्राथमिक उपचार के अलावा लोगों को मौसमी रोगों से बचाव में मददगार है। अलबत्ता अन्य सुविधाएं यहां नहीं है। मलेरिया के बुखार की जांच तक यहां मुमकिन नहीं है। इसी वजह से यहां बीते दो महीनों में मात्र 335 मरीज आए।
इलाज नहीं मिलने से एक पखवाड़े में हो चुकी दो मौतें
चंपावत। तल्लादेश क्षेत्र के 20 से ज्यादा रोडविहीन गांवों के लोगों को पहले लंबी पद यात्रा कर रोड तक पहुंचना होता है। उसके बाद इलाज के लिए सड़क का सफर शुरू होता है। अधिकतर लोग मंच अस्पताल से नाउम्मीद होने से चंपावत पहुंचते हैं। रोड वाले आखिरी गांव तामली की चंपावत से 53 किमी की दूरी है। वैसे अस्पताल के प्रति निराशा इस कदर है कि इलाज नहीं मिलने से एक पखवाड़े में ही दो मौतें हो चुकी हैं।
उल्टी-दस्त से पीड़ित एक बालिका ने चंपावत पहुंचने से पहले दम तोड़ दिया था, जबकि एक अधेड़ व्यक्ति की अस्पताल पहुंचने के बाद मौत हो गई थी।