चंपावत। काश्तकार दयाकृष्ण हर साल खरीफ की फसल से पहले बारिश के लिए घटकू देव की शरण लेते हैं। लेकिन अच्छी पैदावार की उनकी मुराद अक्सर पूरी नहीं हो पाती। इसकी वजह सिंचाई के साधनों का ना होना है। खेत में पैदावार लहलहाएगी या सूख जाएगी, ये इंद्रदेव पर निर्भर है। चंपावत जिले में सिर्फ 15 प्रतिशत खेतों में ही सिंचाई की व्यवस्था है। सिंचाई के साधनों की कमी किसानों की मेहनत पर पानी फेर रही है।
केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन सिंचाई के बंदोबस्त के बगैर ये लक्ष्य कैसे हासिल होगा, यह एक अहम सवाल बना है। फिलहाल तो आय बढ़ना दूर किसानों की लागत निकलना ही चुनौती बन रहा है। जिले में ज्यादातर कृषि भूमि में सिंचाई का प्रबंध ढीलाढाला है। जिले में 16610 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती है। लेकिन सिंचाई की सुविधा बमुश्किल 2511 हेक्टेयर क्षेत्र (15.11 प्रतिशत) में है। सिंचाई के साधनों की कमी किसान की मेहनत पर भारी पड़ रही है।
बेकाम हैं 40 प्रतिशत नहरें
चंपावत जिले में कुल 98 नहरें हैं। लेकिन इनमें से ठीकठाक हाल में महज 58 नहरें ही हैं। 20 नहरें बरसात और दूसरी आपदा में टूटी है। 20 नहरें पूरी तरह निष्प्रयोज्य हो गई हैं। इसके चलते खेतों को इन नहरों का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
बीसूका में डी श्रेणी में है सिंचाई
सिंचाई मद में जिला योजना में जिले के लिए कुल 260.20 लाख रुपये आवंटित हैं। इसमें 204 लाख रुपये राजकीय सिंचाई और 56.20 लाख लघु सिंचाई को दिए गए हैं। राजकीय सिंचाई में इस साल 150 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित होना है, लेकिन लक्ष्य अब तक महज एक हेक्टेयर क्षेत्र ही पूरा हो सका है। बीस सूत्रीय कार्यक्रम के तहत डी श्रेणी मिली है। सिंचाई विभाग के ईई एसएस रावत का कहना है कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं।
कोट
सिंचाई के साधनों की कमी से किसान की मेहनत प्रभावित हो रही है। ऐसे में उसे मानसून पर आश्रित रहना पड़ता है। कृषि, उद्यान विभाग सिंचाई और लघु सिंचाई विभाग के साथ समन्वय बनाकर सिंचित क्षेत्र को बढ़ाने की कार्ययोजना तैयार कर रहा है।
राजेंद्र उप्रेती,
मुख्य कृषि अधिकारी।
पहाड़ में सिंचाई की व्यवस्था नहीं होने से काश्तकार की मेहनत बर्बाद हो रही है। उसे खेतों की जुताई के साथ ही आसमान की ओर नजरें गढ़ानी पड़ती है।
दयाकृष्ण ओली, रेगड़ू।
सिंचाई की कमी किसानों के लिए सिरदर्द बन रही है। नतीजा यह कि खेती से मुनाफा नहीं, बल्कि सिंचाई का बंदोबस्त करने में ही जेब कट रही है।
परमेश्वर सिंह, मूलाकोट।