जिले से मात्र 30 किमी की दूरी पर स्थित गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं, इनमें से एक सल्ली ग्राम पंचायत का कुकड़ौनी गांव भी है, जहां के लोगों को बिजली की रोशनी नसीब नहीं हो पाई है। इस गांव में आज भी उजाले के लिए मिट्टी तेल की ढिबरी ही एकमात्र सहारा है। उस पर ग्रामीणों को मिट्टी का तेल भी पर्याप्त नहीं मिलता है। सोलहवीं सदी की जीवनशैली जी रहे यहां के ग्रामीणों की परेशानियां तब बढ़ जाती हैं, जब रात के घुप अंधेरे में भारी बरसात होती है। कब कौन सा गांव आपदा की चपेट में आ जाए कहा नहीं जा सकता है।
गांव में बिजली न होने के कारण यहां के लोग रेडियो के माध्यम से दुनिया से जुड़े हुए हैं। कुछ लोगों के पास मोबाइल फोन हैं, जिन्हें चार्ज कराने के लिए उन्होंने सोलर पैनल खरीदा है, जिनके पास सोलर पैनल नहीं उन्हें मोबाइल चार्ज कराने के लिए तीन किमी दूर सल्ली जाना पड़ता है। गांव में लोग चीड़ का छिलका जलाकर रोशनी करते आ रहे हैं। इसी रोशनी में बच्चे अपना भविष्य टटोल रहे हैं। ग्रामीण बचन सिंह, ठाकुर सिंह, जोगा सिंह, महाजन सिंह आदि का कहना है कि चीड़ के छिलके से निकलने वाले कार्बन के कारण गांव के अधिकांश लोग दमा और आंखों की बीमारी से पीड़ित हैं।
बरसात में सिहर उठते हैं ग्रामीण
बिजली सुविधा से वंचित कुकड़ौनी गांव के लोग बरसात के मौसम में सिहर उठते हैं। भौगोलिक रूप से चारों ओर से पर्वतों से घिरा होने के कारण रात्रि में जब गरज चमक के साथ बरसात होती है तो ग्रामीणों की नींद उड़ जाती है।
पलायन के चलते गांव में बचे 12 परिवार
सल्ली ग्राम पंचायत के कुकड़ौनी गांव के बालीपीपल तोक में जहां एक दशक पूर्व तक 50 परिवार आबाद थे, वहीं आज पलायन के कारण गांव में केवल 12 परिवार ही रह गए हैं। गांव तक बिजली नहीं पहुंचने से इन परिवारों को आज भी चीड़ के छिलके के उजाले में रातें बितानी पड़ रही हैं।
जल्द होगा विद्युतीकरण
ग्राम प्रधान पूरन सिंह रावत का कहना है कि पूर्व में कुकड़ौनी को राजीव गांधी विद्युतीकरण मिशन के तहत चयनित किया गया था, लेकिन कुछ दिक्कतों के चलते विद्युतीकरण नहीं हो पाया। वर्तमान में गांव को विद्युतीकृत किए जाने के लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं।