1889 से शुरू चंपावत के मल्लीहाट की रामलीला ने कई बेहतरीन कलाकार दिए हैं। सिर्फ कलाकार ही नहीं, दर्शकों में भी आस्था इस कदर थी कि राजतिलक में राम और सीता के पात्रों को माला पहनाने के लिए हर कोई आतुर रहता था। कुछ कलाकार तो ऐसे भी हैं कि दशकों तक एक ही किरदार को बेहद शिद्दत से निभाते थे। उस दौर में ये कलाकार नियम व संयम का पूरी कड़ाई से पालन करते थे।
ऐसे ही एक कलाकार हैं जगदीश पचौली। जिन्होंने डेढ़ दशक तक राम का अभिनय किया है। जगदीश बताते हैं कि रामलीला में अभिनय करने का उनका सफर महज 11 साल की उम्र में 1972 से शुरू हुआ। शुरुआत शत्रुघ्न के अभिनय से की। अगले दो सालों में उन्हें भरत और लक्ष्मण के पात्र का अभिनय का मौका मिला।
1975 में पहली बार उन्हें राम का अभिनय करने का मौका मिला। जगदीश के बेहतरीन अभिनय का परिणाम था कि उन्होंने डेढ़ दशक तक राम के पात्र का शिद्दत से किया और जिया। इसके बाद उन्होंने अंगद, कैकई, दशरथ, जनक, सूर्पणखा, सुलोचना और कौशल्या के पात्रों का जीवंत अभिनय किया।
वर्तमान में जीआईसी द्यारतोली में हिंदी के प्रवक्ता पद पर कार्यरत जगदीश बताते हैं कि उस समय कलाकारों को कड़े नियमों का पालन करना पड़ता था। रामलीला के दौरान ठंडी चीजों के अलावा प्याज और लहसुन से परहेज करना पड़ता था। तब कमेटी राम, लक्ष्मण, सीता, भरत और शत्रुघ्न के पात्रों को हर रोज दूध मुहैया कराती थी। वे कहते हैं कि तब राजतिलक के दिन लोग घरों से गेंदे के फूल की माला बना कर लाते थे। हर किसी की अभिलाषा राम और सीता के पात्रों के गले में खुद की बनाई माला पहनाने की होती थी। जगदीश का कहना है कि राम के पात्र के अभिनय का ही कमाल है कि वे आज तक हर व्यसन से दूर रह सके हैं।
चटाई-टाट से घेरते थे जगह
करीब 1993 तक रामलीला के प्रति लोगों में जबर्दस्त आस्था रहती थी। भीड़ इस कदर होती थी कि लोग दिन ढलने से पहले ही लोग रामलीला देखने के लिए चटाई, टाट आदि बिछा कर जगह घेर लिया करते थे। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए मांदली के करम सिंह खाती का कोई सानी नहीं था। उनकी एक आवाज पर दर्शक शांत हो जाते थे। कई दशकों से मल्लीहाट की रामलीला से जुड़े सुरेश साह बताते हैं कि लोग 52 किलोमीटर दूर तामली, चल्थी, बिस्ज्यूला, पल्सों और सिप्टी से पैदल चंपावत रामलीला देखने आते थे।