चंद और कत्यूरी राजवंशों की राजधानी रही चंपानगरी में यूं तो कुदरत ने जमकर प्राकृतिक सौंदर्य लुटाया है, मगर कुदरती रूप से बेहद खूबसूरत चंपावत और आसपास के इलाकों में तेजी से फैलता कंक्रीट का जंगल ऐतिहासिक नगरी की खूबसूरती को लीलने लगा है। जिला मुख्यालय एवं आसपास के इलाकों में सीमेंट के बढ़ते प्रचलन और अनियोजित भवन निर्माण ने यहां प्राकृतिक सौंदर्य के स्थान पर कंक्रीट का एक बेतरतीब जंगल जैसा खड़ा कर दिया है, जिसे लेकर पर्यावरणविद और बुद्धिजीवी वर्ग खासा चिंतित है।
एकीकृत उत्तर प्रदेश के समय में वर्ष 1997 में चंपावत के अलग जिला बनने एवं वर्ष 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यहां आवासीय और व्यावसायिक भवनों के निर्माण में बेतहाशा तेजी आई है। पूर्व फौजी, सरकारी कर्मचारियों के अलावा जिले के दूरस्थ क्षेत्रों पर रहने वाले साधन संपन्न लोगों ने मुख्यालय में जमीन खरीदकर मकान बना लिए हैं। आलम यह है कि खेती-किसानी योग्य जमीन का इस्तेमाल भी व्यावसायिक भवन निर्माण में किया जा रहा है। जिला बनने के बाद मुख्यालय में करीब 25 प्रतिशत खेतीयोग्य जमीन पर भवन बन चुके है। मुख्यालय का लगातार विस्तार होने से यहां सरकारी एवं गैर सरकारी भवनों के साथ ही आवासीय भवनों का निर्माण लगातार जारी है।
सीमेंट के बढ़ते प्रचलन से पर्वतीय क्षेत्रों में मकान निर्माण के परंपरागत साधन और तौर-तरीके हाशिए पर पहुंच गए है। कंक्रीट की बाढ़ एक ओर जहां प्राकृतिक खूबसूरती को नष्ट कर रही है, वहीं इससे पर्वतीय इलाकों का शुद्ध समझा जाने वाला वातावरण भी दूषित हो रहा है। -कैलाश चंद्र लोहनी, पर्यावरणविद
सीमेंट के मकान जहां गर्मियों में बहुत अधिक गरम, तो जाड़ों में जरूरत से ज्यादा ठंडे होते हैं, बावजूद इसके लोग सीमेंट का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं, यदि इसी तेजी से सीमेंट का निर्माण बढ़ता रहा तो भावी पीढ़ी प्राकृतिक हरियाली को देखने के लिए तरस जाएगी। -देवेंद्र ओली, पर्यावरणविद