चंद्रशेखर जोशी, चंपावत। लॉकडाउन में कामधंधे ठप होने से कामगरों की मदद को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्मिक अपील की थी, मगर गुजरात के अहमदाबाद में इस जिले के कामगरों का काम तो छूटा ही, उनसे किराया वसूलने में भी मकान मालिक पीछे नहीं रहे। अहमदाबाद से लालकुआं के लिए रेल में सवार लधिया घाटी के टांण मल्ला के भोला दत्त कहते हैं कि उन्हें 14 मई तक किराये के रूप में एक-एक रुपये देना पड़ा। भोला अहमदाबाद में एक स्टील प्लांट में काम करते थे। एक अन्य कामगार के साथ वे यहां पांच हजार रुपये महीने के किराये में कमरा लेकर रहते थे। उनका साथी 2 अप्रैल को ही अपने घर मेरठ चला गया। इसके चलते अप्रैल व मई का पूरा किराया भी भोला के मत्थे पड़ा। कहते हैं कि 22 मार्च से वे कमरे में ही बंद रहे। अलबत्ता खाने की कुछ व्यवस्था में कंपनी ने सहयोग किया। लेकिन वेतन 21 मार्च तक का ही मिला। इन सबके बावजूद भोला और उनके अन्य साथी घर वापसी को एक बड़े सपने के पूरा होने जैसा मान खुश हैं। भोला के साथ ही रमक के लक्ष्मी दत्त और हेम सिंह भी अहमदाबाद से लालकुआं आई रेल में सवार थे। ये दोनों भी दो साल से स्टील प्लांट में काम करते हैं। इन दोनों प्रवासियों से भी किराया वसूला गया। 3500 रुपये मासिक किराया है। बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद की अवधि का किराया उनसे वसूला गया। अलबत्ता खाने की व्यवस्था कंपनी ने की। साथ ही कंपनी ने बचाव के लिए मास्क भी दिए। मगर अहमदाबाद प्रशासन या किसी जन प्रतिनिधि से कोई मदद नहीं मिली। रविवार से अहमदाबाद से आई इस ट्रेन में उत्तराखंड के 1400 यात्रियों में से 194 लोग चंपावत जिले के हैं। ये तमाम लोग घर वापस आने को बेताब हैं।
--::: अपने प्रदेश में काम मिला, तो क्यों छोड़ेंगे अपना घर :: चंपावत। गुजरात से लौट रहे प्रवासी काम मिलने की सूरत में फिर से न जाने की बात कहते हैं। इन प्रवासियों का कहना है कि उत्तराखंड में रोजगार उपलब्ध हो जाएगा, तो अपने जिले अपने प्रदेश में रहेंगे। दूसरे प्रदेश काम के लिए मजबूरी में ही गए थे। अगर अपने गांव या अपने जिले में 15 हजार रुपये का काम या स्वरोजगार के लिए मदद मिली, तो वे दूसरी जगह जाने की सोचेंगे भी नहीं। तीनों प्रवासी युवा कहते हैं कि खूब पसीना बहाने के बाद आज उनके पास ढाई हजार रुपये ही बचे हैं।
हेम सिंह।
- फोटो : AMAR UJALA
हेम सिंह।
भोला दत्त।
- फोटो : AMAR UJALA
भोला दत्त।