पाटी में बैठकी होली गाते होल्यार।
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चंपावत जिला मुख्यालय सहित आसपास के गांवों में आजकल बैठकी होलियों की धूम मची हुई है। पौष माह के पहले रविवार से ही जिले के पर्वतीय अंचलों में बैठकी होली का गायन शुरू हो जाता है जो खड़ी होली के समापन तक जारी रहता है। काली कुमाऊं के नाम से विख्यात चंपावत क्षेत्र में जहां खड़ी होली गायन काफी मशहूर है वहीं यहां धार्मिक स्थलों के अलावा निजी आवासों में होने वाली बैठकी होली की भी खास मान्यता है। जिला मुख्यालय में पहले चौबे होली का आयोजन किया जाता था। लेकिन बीते तीन दशकों से चौबे होली का गायन बंद हो गया है।
चंपावत जिला मुख्यालय को अल्मोड़ा के बाद दूसरी सांस्कृतिक नगरी माना जाता है। यहां की खड़ी होली जितनी प्रसिद्ध है, वहीं यहां की बैठकी होली का भी जबाब नहीं। विभिन्न राग और फागों में गाई जाने वाली बैठकी होली को जो एक बार सुन ले तो उसी में झूमने लगता है। पौष माह के पहले रविवार से शुरू होने वाले बैठकी होली गायन में समय और रागों का विशेष ध्यान रखा जाता है। होल्यार दिनेश बिष्ट के अनुसार जहां बैठकी होली का गायन राग जंगला काफी से किया जाता है, वहीं उसका समापन भैरवी राग से होता है। चंपावत जिला मुख्यालय में बैठकी होली गायन की पंरपरा को जिंदा रखने के लिए विभिन्न संगठनों की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। लोक कलाकारों का मानना है कि लगातार प्रयास किए जाने से हाशिए में जा रही सांस्कृतिक विरासत को बचाने के साथ ही लोकप्रिय ही बनाया जा सकता है।
एक साथ पचास से सौ होल्यार करते हैं प्रतिभाग
चंपावत। होल्यार धर्म सिंह के अनुसार कुमाऊं में गाई जाने वाली बैठकी होली की एक खास बात ये है कि होली को एक साथ पचास से सौ लोग मिलकर गाते हैं। इतने बड़े कोरस में शायद ही कहीं होली का गायन किया जाता हो। सामूहिक कंठों से निकली स्वर लहरियां श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। पर्वतीय अंचलों में बैठकी होली देवालयों, सार्वजनिक स्थानों या होली आयोजकों के घरों में गाई जाती है। इसमें गांव के लोग बतौर गायक अथवा श्रोता भाग लेेते हैं। (संवाद)