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बगवाल मेले पर भारी कोरोना महामारी

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पाटी/चंपावत। देवीधुरा के बगवाल मेले पर लगातार दूसरी बार संशय है। कोरोना महामारी के चलते इस बार भी मां बाराही धाम में लोग बगवाल के रोमांच के दीदार नहीं कर सकेंगे। जिला पंचायत की ओर से संचालित इस मेले में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। कोविड-19 के खतरे के बीच इस मेले पर पिछले साल से ग्रहण लगा है। लगातार दूसरी बार इस एतिहासिक मेले का लटकना तकरीबन तय है। अभी इसका औपचारिक एलान होना बाकी है। लेकिन मेले के न होने की प्रबल संभावना को देखते हुए बगवाल की परंपरा को प्रतीकात्मक रूप से दर्शकों के बगैर कराने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है।
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देवीधुरा में स्थित मां बाराही धाम मंदिर के खोलीखांड दुबाचौड़ में हर साल आषाड़ी कौतिक (रक्षाबंधन) के दिन बगवाल होती है। इस बार बगवाल 22 अगस्त को होगी। फल-फूलों से खेली जाने वाली बगवाल में चार खाम (चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया और वालिग) और सात थोकों के योद्धा फर्रों के साथ शिरकत करते हैं। इसके साक्षी बनने के लिए दूरदराज से कई लाख लोग एकत्र होते हैं। लेकिन पिछले साल की तरह ही इस बार भी कोरोना के चलते दो सप्ताह तक चलने वाले बगवाल मेले के होने की संभावना खत्म हो गई है। मेले में दूरदराज से कारोबारी आते हैं। पिछली बार चारों खामों के योद्धाओं ने प्रतीकात्मक रूप से बगवाल खेली थी। इसमें पूजा अर्चना और मंदिर की परिक्रमा हुई थी। (संवाद)
कोट
बगवाल की परंपरा को कोरोना के बीच कैसे निभाया जाएगा, इस पर जल्द ही मंदिर समिति के सदस्यों के साथ बैठक कर अंतिम रूप दिया जाएगा। वैसे कोरोना की तीसरी लहर के अंदेशे के बीच इसे सांकेतिक रूप से ही किया जाएगा।
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विनीत तोमर,डीएम, चंपावत।
कोट कोरोना के खतरे के मद्देनजर बगवाल मेले की संभावना बेहद कम है। परंपरा और धार्मिक मान्यता के हिसाब से बगवाल को प्रतीकात्मक रूप से आयोजित किया जा सकता है। अलबत्ता इसे लेकर अंतिम निर्णय इस माह होने वाली बैठक में लिया जाएगा।
पंडित कीर्ति बल्लभ जोशी, पीठाचार्य, मां बाराही धाम।
परंपरा निभाने के लिए खेली जाती है बगवाल
पाटी। चारों प्रमुख खाम (चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया और वालिग) के योद्धा पूर्णिमा के दिन पूजा-अर्चना के बाद फल-फूलों से बगवाल खेलते हैं। माना जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि देने का रिवाज था, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि के लिए बारी आई, तो वंशनाश के डर से बुजुर्ग महिला ने मां बाराही की तपस्या की। देवी मां के प्रसन्न होने और वृद्धा की सलाह पर चारों खामों ने प्रतीकात्मक बगवाल खेलने पर सहमति जताई। तभी से ही बगवाल का सिलसिला चला आ रहा है।
विधि विधान से हुई मां बाराही की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा
पाटी/देवीधुरा (चंपावत)। मां बाराही धाम देवीधुरा में रविवार को मां वज्र बाराही की मूर्ति की विधि विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठा की गई। अब तक यहां मा वज्र बाराही की शक्ति के साथ सिंहासन डोलने में विराजमान उनकी अदृश्य मूर्ति स्थापित की गई थी। कल्याणिका हिमालयन न्यास कनरा-डोल आश्रम के श्री 1008 स्वामी कल्याण दास जी महाराज ने मां की यह भव्य मूर्ति मंदिर को अर्पित की थी। धाम के पीठाचार्य पंडित कीर्ति शास्त्री के नेतृत्व में वेदाचार्य चंद्रशेखर जोशी, आचार्य प्रकाश जोशी, राजेंद्र जोशी ने वैदिक और पौराणिक मंत्रों के साथ पूजा अर्चना की।
आठ घंटे तक चली इस पूजा-अर्चना के सैकड़ों लोग साक्षी बने। मुख्य यजमान के रूप में मंदिर कमेटी के संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया, अध्यक्ष खीम सिंह लमगड़िया, हयात सिंह बिष्ट, उद्योगपति नरेंद्र लडवाल, कानपुर से आए नवीन जोशी, गीतांजलि सेवा समिति के अध्यक्ष सतीश चंद्र पांडे ने सपत्नीक पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर चार खाम, सात थोकों की ओर से लमगड़िया खाम के प्रमुख वीरेंद्र सिंह लमगड़िया, वालिग खाम के बद्री सिंह बिष्ट, चम्याल खाम के गंगा सिंह चम्याल, गहरवाल खाम के राम सिंह व माधो सिंह, गुरना के धर्मानंद पुजारी, हरिदत्त पुजारी, फुलाराकोट के चतुर सिंह, राजेंद्र बिष्ट, मदन बोरा, तारा चम्याल, कल्याणी आश्रम के स्वामी कपिल, लक्ष्मीकांत पांडे, विपिन पांडे आदि ने अपने-अपने क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हुए पूजा की। जगत कल्याण के लिए यज्ञ, कौमारी पूजन के साथ भंडारा भी हुआ।
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