सरकार शराब की दुकान हर हाल में खुलवाने पर आमादा है, जबकि बुनियादी जरूरतों की अनदेखी की जा रही है। शराब की दुकान के विरोध में महिलाएं अपने जरूरी काम छोड़ धरने पर बैठी हैं। सरकार लगातार उनकी मांगों की अनदेखी कर रही है। आंदोलनरत इन महिलाओं का कहना है कि सरकार को केवल राजस्व वसूली से ही मतलब है।
सरकार महिलाओं के दर्द को महसूस नहीं कर पा रही है। उल्टा इन महिलाओं पर मुकदमे दर्ज करवा रही है। उनका कहना है कि सरकार को चाहिए कि वो शराब के बजाए लोगों को जरूरी सुविधाएं मुहैया करवाएं।
शराब से महिलाएं होती हैं सर्वाधिक प्रभावित
शराब की दुकान के विरोध में मुकदमा झेल रही आंदोलनकारी हेमा जोशी का कहना है कि सरकार को चाहिए कि उत्तराखंड में शराब की पूर्णबंदी होनी चाहिए क्योंकि शराब से सबसे ज्यादा प्रभावित महिला ही होती है।
सरकार को है केवल अपने राजस्व की चिंता
चंद्रकला का कहना है कि सरकार को केवल राजस्व की ही चिंता है। लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि सरकार पहले लोगों को बुनियादी सुविधाएं दे।
दवाएं तो नहीं घर-घर पहुंचाई जा रही है शराब
कमला देवी का कहना है कि अस्पताल में लोगों को दवाईयां नहीं मिल पा रही है न ही डाक्टरों की तैनाती है। उल्टा घर-घर में शराब पहुंचाई जा रही है। शराब की पूर्ण बंदी होनी चाहिए।
शराब के चलते बुझे कई घरों के चिराग
नीतू पटवा का कहना है कि शराब ने कई घरों को उजाड़ दिया है। शराब के चलते कई घरों के चिराग बुझ गए हैं। बावजूद सरकार का शराब को बढ़ावा देना उसकी नीयत को दर्शाता है।
विरोध के बावजूद दुकान खोलना ठीक नहीं
हेमा कुंवर का कहना है कि अन्य योजनाओं से भी राजस्व जुटाया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि वो राजस्व बढ़ाने के लिए पर्यटन समेत अन्य गतिविधियों पर ध्यान दे। विरोध के बावजूद जबरन शराब की दुकान खोलने से सरकार की मंशा का पता चलता है।