जीआईसी मूलाकोट का पुराना भवन अब जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। इस भवन में पढ़ाई तो नहीं होती, लेकिन बच्चे खेल-कूद करते हैं, जिससे भवन के गिरने का अंदेशा बना रहता है। शिकायत के बावजूद शिक्षा विभाग भवन ढहाने की कार्यवाही नहीं कर रहा है।
दरअसल, ग्रामीणों ने 1964 में यहां व्यक्तिगत प्रयासों से हाईस्कूल की स्थापना की थी। जिसके लिए यहां के लोगों ने मिलकर आठ कमरों का विद्यालय भवन श्रमदान से निर्मित किया। 14 साल बाद विद्यालय को हाईस्कूल तथा वर्ष 2000 में इंटर कॉलेज का दर्जा दिया गया। इस बीच विभिन्न मदों से यहां एक-एक, दो-दो भवनों का नया निर्माण होता गया। जिससे श्रमदान से बनाए गए भवन की उपयोगिता नहीं रही।
अब भवन की दीवार और छत में दरारें पड़ गई हैं। इसके अंदर बच्चे ख्ेालते हैं। यह जर्जर भवन कभी भी धराशायी हो सकता है। 18 दिसंबर को मूलाकोट में आयोजित बहुदेश्यीय शिविर में मुख्य शिक्षाधिकारी ने भवन का निरीक्षण कर इसे खतरनाक बताया तथा लोनिवि से भवन का तकनीकी मूल्यांकन कर इसे ध्वस्त करने की बात कही गई। लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
भवन ध्वस्तीकरण की संस्तुति भेजी गई
पीटीए अध्यक्ष हर सिंह अधिकारी का कहना है कि स्कूल भवन की हालत बेहद खतरनाक है। पीटीए की ओर से कई बार शिक्षाधिकारियों का ध्यान खींचा गया है। यहां तक कि खंड शिक्षाधिकारी ने भी सीईओ को भवन ध्वस्तीकरण की संस्तुति की गई है, लेकिन समस्या जैसी की तैसी बनी है।
प्रयोगशाला कक्षों का होगा निर्माण
प्रधानाचार्य प्रभाकर मिश्र के अनुसार इस भवन को ध्वस्त किया जाना जरूरी हो गया है। किसी भी समय भवन गिर सकता है। इस स्थान पर विद्यालय के लिए प्रयोगशाला कक्षों का निर्माण भी किया जाना है। विद्यालय के पास अन्यत्र ऐसी कोई जमीन नहीं है, जहां लैब बनाई जा सके।