देवभूमि उत्तराखंड की लोक कला, संस्कृति, परंपराओं, मान्यताओं आदि को संरक्षण देेने के सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की आंचलिक कलाकारों ने सराहना की है। वहीं, उनका कहना है कि जब तक लोक संस्कृति को जीवंत रूप देने में लगे कलाकारों की सुध सरकार नहीं लेगी, तब तक यह कार्यक्रम हकीकत में तब्दील नहीं हो सकेगा।
आंचल कला केंद्र के मोहन पांडेय की अध्यक्षता और रंगकर्मी गिरीश बर्गली के संचालन में हुई बैठक में कलाकारों का कहना था कि उत्तराखंड में लोगों को आंचलिक सांस्कृतिक से रूबरू कराने और लोगों को रोजगार से जोड़ने में लगे सांस्कृतिक दलों को आज भी उत्तर प्रदेश के जमाने से मानदेय दिया जा रहा है। वक्ताओं का कहना था कि अब तक कलाकारों को कोई पहचान नहीं की गई है। उत्तर मध्य क्षेत्र एवं केंद्र सरकार के अनुरूप कलाकारों को एक हजार रुपये प्रति कार्यक्रम और दल नेता को दो हजार रुपये दिया जाना चाहिए।
इलाहाबाद तथा चंडीगढ़ जोन में ए से सी ग्रेड दलों का पारिश्रमिक 6 से 10 हजार रुपये है, लेकिन उत्तराखंड में बेहद कम मानदेय है। साथ ही संस्कृति विभाग एक समय में एक ही कार्यक्रम देता है, जिससे कलाकारों को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। हेमराज, गोकुल बिष्ट, विमला बोहरा, विनोद कुमार, शेखर जोशी आदि का कहना था कि प्रदेश में करीब 450 दल 10 हजार सदस्यों के सहारे सांस्कृतिक संरक्षण के काम में जुटे हैं।