उत्तराखंड विधानसभा के चौथे चुनाव में पहली बार चंपावत सीट से एक भी निर्दलीय मैदान में नहीं होगा। दूरदराज के क्षेत्रों में लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने में आ रही परेशानी को इसकी सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है।
चंपावत विधानसभा पर पहले तीन चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी बहुतायत में मैदान में उतरे। इन तीन चुनावों के कुल 37 उम्मीदवारों में से 20 निर्दलीय थे। इतना होने पर भी निर्दलियों का प्रदर्शन हर चुनाव में निहायत कमजोर रहा। दो उम्मीदवारों को छोड़ शेष 18 की जमानत तक नहीं बचा सके। इसकी बड़ी वजह निर्दलियों का वोटरों तक चुनाव चिन्ह न पहुंचा पाना मानी जा रही है। इस बार निर्दलीय प्रत्याशियों को तीन फरवरी को चुनाव चिन्ह का आवंटन किया जाएगा। 15 फरवरी को मतदान होगा। इस तरह केवल 13 दिन ही इन प्रत्याशियों को सिंबल के साथ चुनाव प्रचार के लिए मिल पा रहा है।
चंपावत सीट का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा पर्वतीय है। यहां वोटर छितरे हुए हैं। सड़क की कमी लोगों तक पहुंचने में सबसे बड़ी अड़चन है। कई इलाके अब भी मोबाइल नेटवर्क से कटे हैं। तल्लादेश, तल्लापाल, क्वैराला घाटी के ढेरों गांव मोबाइल और संपर्क मार्ग से कटे हैं। ऐसे में इन ग्रामीण इलाकों तक निर्दलियों के लिए चुनाव निशान पहुंचाना भी आसान नहीं है। संगठन का न होना और संसाधनों की कमी भी उनकी राह को और कठिन बनाती है। लोहाघाट सीट में पहले दो चुनाव में 22 उम्मीदवारों में से 12 निर्दलीय थे। इन सभी की जमानत जब्त हो गई थी।
पहले चुनाव में दो निर्दलियों ने नाकों चने चबवाए थे
2002 के विधानसभा चुनाव में चंपावत सीट से कांग्रेस के बागी निर्दलीय प्रत्याशी तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष मदन सिंह महराना ने विजयी रहे कांग्रेस के उम्मीदवार हेमेश खर्कवाल को नाकों चने चबवाए थे। उस समय जीत का अंतर महज 395 वोट का रहा था। उसी चुनाव में दूसरी निर्दलीय प्रत्याशी विमला सजवान ने भी 14 प्रत्याशियों में चौथा स्थान हासिल किया था।
चंपावत विधानसभा सीट
चुनावी वर्ष कुल प्रत्याशी निर्दलीय जमानत जब्त
2002 14 9 7
2007 11 6 6
2012 12 5 5
कुल 37 20 18