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स्वतंत्रता दिवस से संबंधित:जेल में भी अनशन किया था सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी

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स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी। (फाइल फोटो ) - फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। सूखीढांग क्षेत्र के नामी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी में देश को आजाद करने की जबर्दस्त ललक थी। पहली जनवरी 1914 को किसान परिवार में जन्मे इस शख्स ने दो बार जेल में भी अनशन किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 50 रुपये के जुर्माने के अलावा अल्मोड़ा से लेकर बरेली तक जेल की यात्राएं की।
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प्राइमरी से आगे की पढ़ाई के लिए खेतीखान गए रामंचद्र चौड़ाकोटी काली कुमाऊं के शेर पंडित हर्षदेव ओली के संपर्क में आए। उनकी प्रेरणा ने युवा चौड़ाकोटी में जोश भरा और वे जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। 28 साल की उम्र में उन्होंने देवीधुरा में बड़ा आंदोलन किया। अंग्रेजों ने दो हफ्ते बंद रखने के बाद उन्हें छोड़ा। आजादी की लड़ाई के दस्तावेज बताते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ योजनाबद्ध जंग के लिए उन्होंने कांग्रेस मंडल चौड़ाकोट संगठन बना श्यामलाताल में संघर्ष छेड़ा। उन्होंने डांडा, बुड़म आदि दूरदराज के इलाकों में जन-जागृति की।
इतिहासविद देवेंद्र ओली बताते हैं कि अंग्रेजों को पहाड़ की ओर बढ़ने से रोकने के लिए चल्थी पर मार्ग अवरुद्ध करने की योजना बनाते वक्त दियूरी में अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए जाने से नाकाम रही। गोरलचौड़ मैदान की अस्थायी जेल में रखने के बाद छह अन्य सेनानियों के साथ उन्हें भी सजा सुनाई गई। अर्थदंड के साथ चौड़ाकोटी को अल्मोड़ा जेल भेजा गया। जेल में भी आंदोलन जारी रखने के चलते अंग्रेजों ने उन्हें बरेली जेल पहुंचा दिया।
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विकास में भी पीछे नहीं रहे चौड़ाकोटी
स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी ने आजादी की जंग ही नहीं, इलाके के विकास के लिए भी जंग लड़ी। उनके बेटे और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के जिलाध्यक्ष महेश चौड़ाकोटी बताते हैं कि 1948 में साधन सहकारी समिति के सभापति, वमनजौल के सरपंच, ज्येष्ठ उप प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने के अलावा 10 जनवरी 2001 में आखिरी सांस लेने से पूर्व तक वे लगातार इलाके की तरक्की के लिए लगे रहे। रामचंद्र सहित सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सम्मान में धुरा में 2013 में सेनानी स्मारक बनाया गया। साथ ही दो साल पूर्व सूखीढांग जीआईसी का नाम उनके नाम पर रखा गया।
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