दारमा घाटी की 20336 फीट सबसे ऊंची दुर्गम, दुरूह खिमलिंग चोटी को फतह कर उसमें तिरंगे समेत आईटीबीपी का झंडा गाढ़ने के बाद यहां लौटने पर हिमवीरों का भव्य स्वागत हुआ।
टीम लीडर द्वितीय कमान अधिकारी भानु प्रताप सिंह, डिप्टी लीडर उपसेनानी सुरेंद्र सिंह पंवार समेत सभी हिमवीरों को जवानों, अधिकारियों ने फूलमालाओं से लाद दिया।
स्वागत समारोह में टीम लीडर भानु प्रताप सिंह ने अभियान के संस्मरण सुनाए। कहा कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों, असीम कठिनाईयों, पग-पग पर मौत का सामना करते हुए आगे बढ़ना आईटीबीपी के हिमवीरों की शक्ति, सामर्थ्य रही है।
इसी के बल पर उनके नेतृत्व में हिमवीरों ने दारमा घाटी की ऊंची चोटी फतह की। उन्होंने कहा कि वहां की चोटियां दूर से देखने पर आसान लगती थीं, लेकिन ज्यों ही उनके नजदीक हम पहुंचते थे, उनका भूगोल हमारी कल्पनाओं से अलग ही था।
मार्ग में हिम पिंडों के लटकते ग्लेशियर से पग-पग में खतरा बना हुआ था। सौ फीट के आईस वॉल को पार करना और भी खतरनाक था।
हवा का दबाव कम होने, बर्फीली हवाएं चलने से माइनस 20 डिग्री तापमान में हिमवीरों ने रेडीमेड भोजन के जरिए अपने दिन बिताकर लक्ष्य पाया।
उन्होंने बताया कि अभियान के दौरान उन्हें कोई जानवर, पक्षी, कीट पतंगा तक नहीं मिला। वहां कोई वनस्पति भी नहीं है। वहां उपसेनानी सुरेंद्र सिंह, सहायक सेनानी कुलदीप रावत, सहायक सेनानी दीवान सिंह, सहायक सेनानी अमरीश कुमार, सहायक सेनानी डॉ. रोहिणी, एसएम अनिल कुमार आदि मौजूद रहे।