चंपावत। तल्लापाल क्षेत्र के मनोज और रेवाधर की मेहनत मौसम ने बर्बाद कर दी, लेकिन बीमा करने के बावजूद उन्हें मुआवजा नहीं मिला। किसानों की ऐसी दिक्कतें कदम-कदम पर हैं। फसलों के बर्बाद होने पर राहत देने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) इसकी एक बानगी है। इस योजना से किसानों को लाभ तो नहीं मिला, लेकिन जेब खूब कट रही है। खरीफ और रबी की फसल में पहले तीन साल तक नुकसान होने के बावजूद किसी किसान को मुआवजा नहीं मिला। सिर्फ चौथे साल 83885 रुपये का मुआवजा मिला।
खेती को नुकसान से बचाने के लिए 2016 के खरीफ सीजन से पीएमएफबीवाई शुरू की गई थी। इस योजना में खरीफ फसल में धान और मड़ुवे एवं रबी फसल में गेहूं को बीमित फसल की श्रेणी में रखा गया। जिले में करीब 7100 हेक्टेयर धान, 4847 हेक्टेयर मड़ुवा और 7315 हेक्टेयर गेहूं की खेती होती है। खरीफ और रबी के शुरुआती तीन-तीन सीजन (2016-17 से 2018-19 तक) में 9291 किसानों ने करीब 2507 हेक्टेयर क्षेत्र के बीमा के लिए 12.51 लाख रुपये प्रीमियम राशि दी, लेकिन मुआवजा किसी को नहीं मिला। पीएम फसल बीमा योजना में मुआवजा देने का आधार तहसील में होने वाले नुकसान को बनाया गया है। जिले में चंपावत-पूर्णागिरि तहसील, लोहाघाट-बाराकोट तहसील के अलावा पाटी तहसील को तीन इकाइयों में बांटा गया है। वर्ष 2019 में खरीफ की फसल में 833 किसानों ने बीमा कराया। इसके लिए किसानों ने 93152 रुपये प्रीमियम राशि दी। मुख्य कृषि अधिकारी राजेंद्र उप्रेती ने बताया कि इनमें से 109 किसानों को 83885 रुपये का मुआवजा मिला है।
बीमा योजना के आधार को बदलने को प्रशासन ने भेजा था खत
चंपावत। जिले में किसानों को फसल का नुकसान होने के बावजूद पीएमएफबीवाई का खास लाभ नहीं मिल पा रहा है। मुख्य कृषि अधिकारी राजेंद्र उप्रेती ने बताया कि इसकी मुख्य वजह पहाड़ के भौगोलिक हालात और नुकसान को मापने वाले नियम है। डीएम सुरेंद्र नारायण पांडेय ने कृषि एवं विपणन अनुभाग को पिछले साल पत्र भेज पीएम फसल बीमा योजना के मुआवजे के तरीकों को मौसम आधारित फसल बीमा योजना की तरह बनाने का आग्रह किया था। ताकि अतिवृष्टि, आपदा, सूखा, ओले गिरने की स्थिति में मौसम आंकड़ों के आधार पर स्वत: ही नुकसान की गणना कर फसल बीमा पर दावा दिया जा सके।
जंगली जानवर भी बन रहे किसानों के लिए मुसीबत
चंपावत। बीमा से होने वाले नुकसान के अलावा किसान सुअर और अन्य जंगली जानवरों के आतंक से भी परेशान हैं। जानवर किसान की मेहनत को एक झटके में बर्बाद कर रहे हैं। चंपावत के आसपास ढकना बड़ेला, नघान, ललुवापानी, सुयालखर्क, बनलेख, चौकी आदि गांवों में सुअरों के आतंक से किसान खेती के लिए हतोत्साहित हैं। देवी दत्त बिनवाल सहित कई किसानों का कहना है कि खेती के रकबे के कम होने की मार ग्रामीणों की आमदनी पर भी पड़ रही है।
नुकसान होने के बावजूद प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लाभ के लिए किसानों को पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। किसानों के हित में इस योजना में सुधार बेहद जरूरी है।
- रघुवर दत्त, सूखीढांग।
पीएमएफबीवाई से किसानों को चार साल में खास लाभ नहीं मिला है। बेहतर हो इस योजना के लाभ भी मौसम आधारित फसल बीमा योजना की तरह ही मिले।
- कृष्णानंद, तल्लापाल क्षेत्र।