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जीडीपी को खेती का सहारा

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खेती के लिए बाराकोट क्षेत्र में प्रवासियों को प्रेरित करते कृषि अधिकारी। - फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट के बीच खेती से आस जगी है। कोरोना काल में कृषि क्षेत्र ने आपदा में नए अवसर पैदा किए हैं। इस बार खरीफ फसल की बुवाई का रकबा करीब 4.55 प्रतिशत बढ़ा है। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी मडुवे की खेती में हुई।
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कोरोना काल में वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल, मई, जून) में देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर शून्य से 23.90 फीसदी नीचे रही। इन निराशाजनक आंकड़ों के बीच सिर्फ कृषि क्षेत्र अपवाद रहा। कृषि क्षेत्र में विकास दर तीन फीसदी से बढ़कर 3.40 फीसदी रही। इसकी छाप चंपावत में भी दिखी। खरीफ सीजन में इस बार 583 हेक्टेयर अधिक 13407.92 हेक्टेयर बुवाई हुई। भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष नवीन करायत का कहना है कि कोरोना काल में प्रवासियों की बदौलत खेती बढ़ी है। करीब 270 प्रवासियों ने खेती की। इनमें से चल्थिया, बमोरा, बिनवाल गांव में बंजर भूमि पर भी खेती की गई। दयाकृष्ण, महेश चंद्र, भुवन, दुर्गादत्त सहित ज्यादातर प्रवासियों ने आसानी से बिकने वाले मडुवे की खेती को सबसे अधिक पसंद किया। मुख्य कृषि अधिकारी राजेंद्र उप्रेती का कहना है कि कोरोना काल में खेती मददगार बनी है। लोगों का खेती की ओर रुझान बढ़ा है। इसलिए खरीफ की खेती के रकबे में इजाफा हुआ है।
बंजर जमीन पर बोई गई मूंगफली
चंपावत। बाराकोट ब्लॉक के बैड़ा बैड़वाल गांव में दो दशक बाद फिर से मूंगफली की खेती शुरू हुई। जलागम की पहल से प्रवासियों ने इस काम को आगे बढ़ाया। जलागम के यूनिट अधिकारी अशोक अधिकारी ने बताया कि यहां 200 नाली जमीन में मूंगफली बोई गई है। इस काम के लिए प्रधान मीनाक्षी जोशी, नवीन जोशी ने भी प्रवासियों को प्रेरित किया।
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सराही गई अदरक की सामूहिक खेती
चंपावत। महामारी के बीच सूखीढांग और गैड़ाख्याली ने खेती को नई राह दिखाई है। यहां 400 नाली खाली पड़ी जमीन पर राज्य समेकित योजना के तहत अदरक की खेती की गई। सहकारी समिति के अध्यक्ष महेश चौड़ाकोटी ने बताया कि जैविक खादों का प्रयोग कर यहां अदरक बोया गया। सहकारिता विभाग ने गैड़ाख्याली में भी अदरक की खेती की।
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