चंपावत/टनकपुर। आस्था के प्रमुख धाम मां पूर्णागिरि दरबार के द्वार शारदीय नवरात्र पर खुल जरूर जाएंगे, लेकिन दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर समिति की ओर से कोरोना से बचने के सभी उपाय मनाने होंगे। सोशल डिस्टेंसिंग के अनुपालन के साथ स्क्रीनिंग, मास्क और सैनिटाइजर का उपयोग अनिवार्य होगा। कोविड संक्रमण के साये में दर्शन शुरू तो होंगे, लेकिन आवाजाही में कई तरह की बंदिशों के चलते यात्रियों में संशय है। मंदिर में दर्शन अनुमति मिलने से पुजारियों और कारोबारियों में राहत की उम्मीद जगी है।
उत्तर भारत के सबसे मशहूर धर्म स्थलों में से एक मां पूर्णागिरि धाम के शारदीय नवरात्र के मेले को शर्तो के साथ हरी झंडी मिल गई है। इस साल 11 मार्च से शुरू होकर 97 दिनों तक चलने वाला मेला एक हफ्ते में ही बंद हो गया था। मेला नहीं होने से क्षेत्र में सौ करोड़ रुपये से अधिक का प्रत्यक्ष-परोक्ष कारोबार प्रभावित हुआ है। मां पूर्णागिरि धाम के पुजारियों और दुकानदारों की आजीविका पर भी इसकी मार पड़ी। मेला न होने से अकेले पूर्णागिरि धाम के पुजारी और दुकानदारों को पांच से छह करोड़ रुपये का घाटा सहना पड़ा है।
चुनरी, त्रिशूल, धूप-अगरबत्ती, नारियल, प्रसाद से लेकर बाल मुंडन, पार्किंग, यातायात, होटल कारोबार, खानपान, वाहन व्यवसाय आदि बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जिला पंचायत के एएमए राजेश कुमार का कहना है कि मेला नहीं होने से पंचायत की आय भी ठप हो गई। राज्य से बाहर के श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए आने में छूट मिलने से नवरात्रों में मां पूर्णागिरि का धाम एक बार फिर जय माता दी के उद्घोष से गुंजायमान होगा। मंदिर समिति अध्यक्ष पं. भुवन चंद्र पांडेय का कहना है कि अब शारदीय नवरात्र में दर्शन की अनुमति दिए जाने से धाम के साथ ही समूचे क्षेत्र में कारोबारी रौनक बढ़ेगी। कोरोना से बचाव के सभी नियमों का पालन करते हुए श्रद्धालुओं को सहजता के साथ देवी दर्शन कराया जाएगा।
नहीं हो सके ये प्रमुख मेले:
मां पूर्णागिरि धाम, मां बाराही धाम देवीधुरा का बगवाली मेला, रीठा साहिब का जोड़ मेला, भिंगराड़ा का एड़ी बालकृष्ण मेला, गुमदेश का चैतोला मेला, सुंई-बिशुंग का वायुरथ महोत्सव, अखिलतारिणी मेला, रमक मेला।