उन्हें सियासत की बारीकियों की कतई समझ नहीं है। उनका काम तो मजदूरी कर गुजर-बसर करना है, लेकिन बिहार की विधानसभा के आठ नवंबर को आने वाले चुनाव नतीजों पर नजर उनकी भी है। अलबत्ता इन बिहारी मजदूरों का कहना है कि जीते कोई भी, उनकी जिंदगी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बस चाहत है कि राजनीति से गरीबों का पेट भरे, तालीम मिले और जिंदगी की न्यूनतम जरूरतें पूरी हो।
बिहार के मोतिहारी जिले के रहने वाले शत्रुघ्न, बेतिया जिले के जाकिर हुसैन, सुनील कुमार, गोपी यहां लंबे समय से मजदूरी कर रहे हैं। उन जैसे ढेरों और बिहारी भी हैं, जो रोजी के लिए अपने प्रदेश को छोड़ पहाड़ पर आने को मजबूर हुए हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में वे वोट देने नहीं जा सके। अलबत्ता पिछले साल लोकसभा चुनाव में उन्होंने मतदान किया था। अब दिवाली के वक्त घर जाएंगे।
कहते हैं कि वोट भले ही नहीं दिया, मगर बिहार के नतीजों की उत्सुकता उन्हें भी हैं। आखिर ये नतीजे आगे की स्थितियों का रास्ता तय करेंगे। ये मजदूर कहते हैं कि दस साल में बिहार में काफी कुछ बदलाव हुआ है। कुछ विकास भी हुआ है, अपराध पर लगाम भी लगी है। पर गरीब वर्ग के हालात में बदलाव की गति ढीलीढाली है।