लोहाघाट (चंपावत)। भारत-नेपाल सीमा का विभाजन करने वाली महाकाली नदी के तट पर बैकुंठ चतुर्दशी (13 नवंबर) को नगरुघाट मेला लगता है। इसकी तैयारी के लिए ढुस्के भी गाए जा रहे हैं। इसकी कई मान्यताएं और परंपराएं रही हैं। नाग कन्या से उत्पन्न अर्जुन के पुत्र नागार्जुन का निवास पाताल लोक में महाकाली नदी के भीतर माना जाता है। नागार्जुन इस क्षेत्र में रहने वाले भारत, नेपाल दोनों ही देशों के लोगों के ईष्ट देवता हैं।
गुमदेश क्षेत्र के इतिहास के जानकार डॉ. सतीश पांडेय का कहना है कि सल्टा बगोटी गांव नागार्जुन देवता के मूल माने जाते हैं। बाहर रहने वाले यहां के लोग अपने ईष्ट देवता के पूजन के लिए यहां आते हैं। त्रयोदशी की रात से ग्रामीण सल्टा बगोटी आकर देव दर्शन करते हैं। यहां नि:संतान महिलाएं कोख भरने की कामना के साथ आती हैं और नागार्जुन देवता का आशीर्वाद लेकर जाती हैं। रातभर जागरण किया जाता है।
चतुर्दशी के दिन सल्टा-बगोटी, जमरसों, डुंगरालेटी, सुल्ला, पासम, मजपीपल, सुनकुरी, गुरेली, डुमडाई, सागर, मडलक आदि 12 गांवों के लोग बारी-बारी से जत्थों के साथ मंदिर में ढोल-नगाड़ों के साथ प्रवेश करते हैं। पूर्णिमा को सुबह चार बजे से धामी डंगरियों के स्नान करने के बाद पर्व स्नान शुरू हो जाता है। बाद में नदी तट में यहां विशाल मेला लगता है। मेले में भारत, नेपाल के इस क्षेत्र में रहने वाले लोग बड़ी संख्या में हिस्सा लेते हैं।
क्षेत्र के बुजुर्ग 88 वर्षीय हीराबल्लभ पांडेय, 75 वर्षीय हवलदार जयदत्त पांडेय कहते हैं कि करीब दो सदी पूर्व स्नान करते समय एक धामी जी अचानक लापता हो गए। धामी जी ने नदी के भीतर पाताल लोक में नागार्जुन देवता का अलौकिक निवास स्थान देखा।
धामी जी को इस शर्त पर भूलोक में आने दिया गया कि वे यहां उनके देखी गई किसी भी बात को लोगों को नहीं बताएंगे। बताते ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। जब धामी जी घर पहुंचे, तो परिजनों ने उन्हें मृत समझ उनका क्रियाकर्म कर दिया। लोग उन्हें भूत मानने लगे। मजबूरन जब वह पाताल लोक के अलौकिक वैभव का बखान करने लगे, तो उनकी मौत हो गई।