हिंग्लादेवी मंदिर के पास स्थित ऐतिहासिक महत्व का बारहखाम (बिरखम) स्थल जमींदोज हो गया है।
जिले में पुरातत्व विभाग की ओर से कई ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को संरक्षित इमारतों की श्रेणी में शामिल किया गया है, लेकिन कई स्थानों पर ऐतिहासिक महत्व के बिरखमों की सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम न किए जाने से बिरखमों का अस्तित्व मिटता जा रहा है। हिंग्लादेवी मार्ग पर स्थित चंद शासकों के दौर में बिरखम का निर्माण किया गया था, लेकिन वर्तमान में बिरखम स्थल के पत्थर और शिलाएं गायब हैं। इस लेकर स्थानीय नागरिकों में रोष है।
पर्वतीय क्षेत्रों में विभिन्न स्थानों में सात-आठ फुट की लंबाई और एक फुट चौड़ाई के स्तंभ गढ़े हुए पाए जाते हैं। इनको स्थानीय भाषा में बारहखाम अथवा बिरखम कहा जाता है। विभिन्न स्थानों पर इन्हें स्थानीय वीर स्तंभ माना जाता है।
इतिहासकार पद्मा दत्त पंत का कहना है कि बिरखमों के निर्माण और इनको स्थापित करने का उद्देश्य क्या रहा होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है। कुछ लोग इनको प्राचीनकाल के वीरों के स्मारकों के रूप में मान्यता देते हैं।
इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार बिरखमों के ऊपर कहीं-कहीं तो देवता, मानव, पशुओं के चित्र अथवा कोई लेख मिलते हैं। इन बिरखमों का निर्माण लंबे यात्रा मार्गों पर किया जाता था, ताकि उस दौर में यात्री इन बिरखमों को पड़ाव के रूप में इस्तेमाल कर सकें।
जिले में एक दर्जन से अधिक स्थलों पर हैं बिरखम
जिले के विभिन्न स्थानों में एक दर्जन से अधिक बिरखम स्थित हैं। गोलू देवता मंदिर परिसर में दो, हिंग्लादेवी मंदिर मार्ग पर एक, क्रांतेश्वर मार्ग में फूलगढ़ी, बाराकोट में तीन, रेगडू, चिलकोट, कलकोट, खेतीखान के निकट सेरा, सिप्टी, बिरगुल, धौनी शिलिंग और क्वैराला घाटी के चानपुर नामक गांव में एक-एक बिरखम हैं। इन बिरखमों में देवी-देवताओं की आकृति के अलावा शेर, हाथी आदि पशुओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं।
सोने की तलाश में नष्ट कर दी गई ऐतिहासिक धरोहर
हिंग्लादेवी मंदिर मार्ग में स्थित बिरखम के बारे में स्थानीय लोगों के अनुसार किवदंती है कि सोने की तलाश में ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट कर दिया गया। बुजुर्ग ग्रामीण लोकमणी, ईश्वरी दत्त और हरीश चंद्र सक्टा आदि बताते हैं कि बिरखमों के निर्माण के शिलान्यास में सोना होने की मान्यता के चलते ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।